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समाज को आज अच्छे गुरू की आवश्यकता है : सत्यानंद

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अमर उजाला ब्यूरो
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करनाल। उत्तम औषधालय के प्रांगण में चल रही कथा के अंतर्गत वैद्य देवेंद्र बत्तरा, दर्शना बत्तरा एवं मानव बत्तरा ने पूजा अर्चना करके हवन यज्ञ किया। महामंडलेश्वर स्वामी सत्यानंद तीर्थ कुशल गुरु की प्राप्ति होने के बाद शिष्य का जीवन परमात्मा के चरणों में सादर समर्पित हो जाता है। आज हमारे सामने कुशल गुरु की आवश्यकता है। जैसे अच्छा चालक होगा तो गाड़ी में बैठाकर मालिक को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देता है। उसी प्रकार से शिष्य के जीवन में गुरु सुंदर, अच्छे, सुलझे हुए चालक हैं जो जीवन रूपी गाड़ी को अपने दिल दिमाग बुद्धि के द्वारा चलाकर शिष्य को मोक्ष के दरवाजे तक पहुंचा देता है और इसके लिए भगवान से प्रार्थना करता है कि वो इसको अपने चरणों में स्थान दे। इसके कई जन्मों के बंधन को काट कर परम शांति की स्थापना करे। कुशल गुरु की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए परमात्मा साधक के जीवन में रोशनी प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा वे परमानंद को प्राप्त करके कर्म बंधन के शिकंजे से मुक्त होकर
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परमात्मा के चरणों में विश्राम करता है। यह एक कुशल गुरु की कृपा है जैसे आप उत्तम औषधालय में वैद्य देवेंद्र बतरा के माध्यम से कार्तिक महात्म्य की कथा श्रवण कर रहे हैं। पं. एमैना गोड प्रभु की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि मनुष्य को गुरु का मान-सम्मान करना चाहिए। उनके दिखाए मार्ग पर चलना चाहिए। जो मनुष्य गुरु से वाद-विवाद करता है उसके दिखाए हुए मार्ग पर नहीं चलता उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता उसकी शक्तियां दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जाती हैं। इससे उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है और वह गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देता है। पं. चेतन देव शर्मा ने कथा करते हुए कहा, कुछ समय बीतने पर सौरदास ने मुनियों को बुलाकर अश्वमेघ यज्ञ किया और गुरू वशिष्ठ जी ने विधिपूर्वक ब्रह्मदि हवि देकर यज्ञ समाप्त किया। फिर स्नान करने के लिए नदी के तट पर चले गये। इतने वो ही राक्षस जिसकी राक्षसी को राजा ने वन में मार दिया था क्रोधित होकर अपना बदला लेने के लिए वहां पर आया। गुरु वशिष्ठ को वहां पर न देखकर उन्हीं का रूप धारण कर राजा से कहने लगा कि हे राजन, हम मांस खाएंगे अत: हमारे लिए मांस बनवाओ हम स्नान करके अभी आते हैं, उस राक्षस ने रसोइये का रूप धारण राजा को मनुष्य का मास पका कर दिया। जब गुरु स्नान करके वापस आए तो राजा ने सोने के थाल में सजा हुआ भोजन उनके सामने परोस दिया। तब गुरू जी ने ज्ञान दृष्टि से मनुष्य के मांस का भोजन जान लिया और क्रोधित होकर राजा को श्राप दिया, हे राजन, तुमने हमको मांस खिलाने की चेष्टा की, हमें राक्षस का भोजन दिया सो तुम राक्षस हो जाओ। राजा ने कहा कि आपकी आज्ञा से ही ऐसा भोजन बनवाया गया है। ऐसा सुनकर वशिष्ठ ऋषि ने ज्ञान दृष्टि से राक्षस द्वारा राजा के छले जाने का वृतांत राजा को सुनाया। इसके पश्चात आरती की गई और प्रसाद वितरित किया गया। डॉ. मानव बतरा ने बताया कि 16 तारीख को औषधालय से कथा में आने वाले सभी भक्तों को बस द्वारा हरिद्वार गंगा स्नान कराया जाएगा। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए वैद्य देवेंद्र बत्तरा, दर्शना बत्तरा, मानव बत्तरा, साबिया बत्तरा, लक्षिता बत्तरा, बेबी समाया, सुभाष गुरेजा, पंडित एमैना गोड, सुभाष वधावन, भारत भूषण, डॉ. दीनानाथ, सतीश सागर आदि ने कथा सुनकर पुण्य लाभ कमाया।
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