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मनमानी की हद : नगर निगम ने नियमों के खिलाफ निजी बैंकों के भर दिये खजाने

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मनमानी की हद : नगर निगम ने नियमों के खिलाफ निजी बैंकों के भर दिये खजाने
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अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
नगर निगम के अधिकारियों की लापरवाही के बाद अब मनमानी सामने आई है। मनमानी भी ऐसी जिसमें न तो नगर निगम एक्ट का ध्यान रखा गया और न ही ऑडिट टीम की सलाह का। जिस बैंक में मन किया, उसी निजी बैंक में करोड़ों रुपये जमा करा दिए। इतना ही नहीं करोड़ों रुपये की एफडी तक करा दी गई। ये सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो नया अधिकारी आया, उसने नये बैंकों में नए खाते खुला दिये। नियमों के खिलाफ और कई साल से ऑडिट डायरेक्टर द्वारा बार-बार निर्देश देने के बावजूद निजी बैंकों में जमकर पैसे जमा कराए गए। नियम के अनुसार निगम के खाते केवल राष्ट्रीयकृत बैंकों में खोले जा सकते हैं।

नगर निगम की वर्ष 2015-16 की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल नगर निगम के दो दर्जनों से ज्यादा बैंकों में 56 अकाउंट हैं। इसके साथ ही 16 खातों में करोड़ों रुपये की एफडीआर (फिक्स डिपोजिट रीसिट) हैं। खास बात यह है कि इस मामले को लेकर डायरेक्टर लोकल ऑडिट पंचकूला की टीम पिछले सालों से इस पर ऑब्जेक्शन लगा रही है, साथ ही निगम के अधिकारियों को सलाह दे रही है कि इन बैंकों में खाते बंद करके बैलेंस राशि को राष्ट्रीयकृत बैंकों या कोओपरेटिव बैंकों में जमा कराएं। बावजूद इसके निगम की अकाउंट ब्रांच, सेक्सन ब्रांच और आला अधिकारियों की ओर इस सलाह को तरजीह नहीं दी गई। आडिट टीम केवल सलाह देती रही, दूसरी ओर निगम के अधिकारी राष्ट्रीयकृत बैंक छोड़कर निजी बैंकों में खाते खुलवाने में व्यस्त रहे। हरियाणा म्यूनिश्पिल एक्ट 1994 की धारा 73 के मुताबिक, निगम का जो भी पैसा होगा वो नेशनलाइज्ड बैंकों में होगा या फिर ट्रैजरी में रखा जाएगा। या ऐसे बैंक जो सरकार ने अप्रूर्व कर रखा है। कई सालों से आब्जेक्शन लगे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नियमों के खिलाफ जाकर निजी बैंकों में खाते खुलवाकर करोड़ों रुपये क्यों जमा कराए जा रहे हैं।
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सरकार की ग्रांट भी निजी बैंकों में
अधिकारी केवल निजी बैंकों में निगम का पैसा जमा कराने के अलावा सरकारी ग्रांट भी निजी बैंकों में डलवा रहे हैं। वर्ष 2015-16 की ऑडिट रिपोर्ट में डायरेक्टर लोकल आडिट की ओर से इसका पूरा ब्यौरा दिया गया है। इसके तहत 31 खातों में एक अरब के करीब रुपये जमा हैं। एक बैंक में 52 करोड़ रुपये जमा हैं। इन बैंकों में कैनरा बैंक, आईडीबीआई, एक्सिस बैंक, इंडस, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, देना बैंक, आंध्रा बैंक, पीएनबी, स्टेट बैंक आफ पटियाला, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया आदि बैंक शामिल हैं।

किस बैंक में कितनी राशि
आडिट रिपोर्ट के अनुसार, निगम के एचडीएफसी कुंजपुरा रोड में चार खाते हैं। एचडीएफसी माडल टाउन और सेक्टर तीन की ब्रांच में भी एक-एक खाता है। इन सभी खातों में 4 करोड़ से लेकर 8 करोड़ रुपये तक की राशि जमा है। एक्सिस बैंक सेक्टर-3 की एक ब्रांच में 14 करोड़ रुपये हैं। यहां पर निगम के दो अकाउंट हैं, इसमें करीब एक करोड़ रुपये जमा हैं। इसी प्रकार आईसीआईसीआई बैंक में 5 करोड़ रुपये हैं। इंडस बैंक में सात एफडी हैं, जिनकी राशि करीब साढ़े छह करोड़ रुपये है, जबकि कोटेक महेंद्रा में 5 करोड़ रुपये जमा हैं।

नगर सुधार मंडल ने भी खुलवाये खाते
ऑडिट टीम ने नगर निगम में मर्ज हुए नगर सुधार मंडल पर भी सवाल उठाए हैं। इंप्रूवमेंट ट्रस्ट (नगर सुधार मंडल) के भी निजी बैंकों में कुल 11 खाते हैं, जो नियमों के खिलाफ हैं। इनमें हरियाणा टाउन इंप्रूवमेंट ट्रस्ट एक्ट की धारा 75 के प्रावधानों के विरुद्ध खाते खुलवाए हुए हैं और करोड़ों रुपये जमा हैं। इस बारे में भी आडिट टीम ने सलाह दी है कि तुरंत प्रभाव से इन खातों को बंद करके कोओपरेटिव बैंकों में खाते खुलवाए जाए। आडिट टीम ने साफ लिखा है कि ये खाते नियमों को दरकिनार करके खोले गए हैं।

इस साल का निगम का बजट
बता दें कि इस साल का निगम का बजट एक अरब, 24 करोड़ रुपये है। वहीं सालभर में विभिन्न मदों से करीब 92 करोड़ रुपये आय होनी है और ऐसे में खातों में कुल 2 अरब 17 करोड़ से ज्यादा की राशि आनी प्रस्तावित है। इसके अलावा 1 अरब 61 करोड़ रुपये विभिन्न कार्यों पर खर्च किये जाने हैं, इसके बाद भी निगम के खजाने में 56 करोड़ रुपये बचेंगे।
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सेक्शन आफिसर बोले, वित्त विभाग की हिदायतों पर खुलवाये खाते
इस बारे में नगर निगम के सेक्शन आफिसर सत्यप्रकाश गांधी ने बताया कि नगर निगम की ओर से सभी अकाउंट सरकार की हिदायतों के दायरे में रहकर खोले गए हैं। जहां तक निजी बैंकों में खाते खोलने की बात है, यह वित्त विभाग की गाइडलाइन के अनुसार हैं। खाते खोलने को लेकर किसी भी प्रकार का लापरवाही व मनमानी नहीं की गई है। हालांकि, आडिट टीम द्वारा आब्जेक्शन लगाने के सवाल का वे सही जवाब नहीं दे पाए। सवाल यह है कि अगर निगम ने खाते वित्त विभाग की गाइडलाइन के अनुसार खुलवाए गए हैं तो आडिट ने ऑब्जेक्शन क्यों लगाए। अगर आब्जेक्शन लगाया गया है तो उसे दूर क्यों नहीं कराया गया है।
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