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सेना ने पहले शहीद माना फिर मौत को आत्महत्या बताया

Fri, 26 Jul 2013 08:37 AM IST
यमुनानगर/गुरदीप सिंह सोढी
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कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले एक सैनिक के परिजन उसे शहीद का दर्जा दिलाने के लिए पिछले 13 वर्षों से कानूनी जंग लड़ रहे हैं।
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सेना ने पहले उसे शहीद माना, लेकिन बाद में आत्महत्या का केस करार दिया। हालांकि हरियाणा सरकार और गांव के लोग उसे शहीद मानते हुए मान-सम्मान देते आए हैं।

1999 में कारगिल युद्ध के दौरान तेजली गांव के सहीराम का बेटा परमिंद्र सिंह (राजपूताना रेजीमेंट) कुपवाड़ा में तैनात था।

उसी दौरान सेना की ओर से तार आया, जिसमें परमिंद्र के मोर्चे पर शहीद होने का जिक्र था। इस खबर से परिजन और गांव वाले सन्न रह गए, लेकिन उन्हें गर्व था कि उनका बेटा देश के काम आया।

राजपूताना रेजीमेंट के अधिकारी और जवान परमिंद्र का पार्थिव शरीर लेकर तेजली गांव आए। गांव में अंतिम संस्कार के दौरान शस्त्र उल्टे कर इस वीर को अंतिम विदाई दी गई।
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करीब दो महीने बाद सेना की ओर से रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें परमिंद्र सिंह द्वारा आत्महत्या करने की बात कही गई थी। परिजनों और गांव वालों ने इस रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया।

प्रदेश सरकार ने भी परमिंद्र को शहीद मानते हुए उसके परिजनों को 10 लाख रुपये दिए। तेजली गांव की सड़क और स्कूल का नाम भी शहीद परमिंद्र सिंह रखा गया।

सेना द्वारा शहीद मानने से इंकार करने को परिजन परमिंद्र का अपमान मान रहे हैं। परमिंद्र के पिता सहीराम का दावा है कि जब बेटे का पार्थिव शरीर गांव लाया गया तो उसके सीने और सिर में गोली लगी थी, उसने आत्महत्या नहीं की थी। सेना ने भी पहले उसे शहीद माना था।

सहीराम ने बताया कि बेटे को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने वर्ष 2000 में केस दायर किया था। वह कहते हैं कि हमें पैसों का लालच नहीं है। मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे बेटे ने देश के लिए जान दी है।

परमिंद्र का केस लड़ रहे एडवोकेट सुरेंद्र श्योराण ने बताया कि यह मामला आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्युनल में चल रहा है, जो हाईकोर्ट के समकक्ष है। इस केस की अगली सुनवाई 24 सितंबर को होनी है।
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सेना से परमिंद्र केस की कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की कापी मांगी गई है। कापी आने के बाद कोर्ट में इस केस पर बहस शुरू होगी। इंक्वायरी में यह पूछा गया है कि सेना ने पहले शहीद मानकर फिर आत्महत्या क्यों और कैसे करार दिया।
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