कैथल। अपनेपन की चली हवाएं हिंदी के शृंगार से, हिंदी स्वर बुला रहे हैं, सात समुंदर पार से...। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित काव्य गोष्ठी में आधारशिला पब्लिक स्कूल जींद की निदेशक और प्राचार्य अंजू सिहाग की कविता की इन लाइनों ने हिंदी भाषा के महत्व को नई ऊंचाई दी। विरासत मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कवियों ने अपनी रचनाओं के जरिये हिंदी भाषा की अहमियत पर चर्चा करते हुए उसके उत्थान पर जोर दिया।
बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित सिहाग ने कहा कि हिंदी को मातृभाषा नहीं मैत्री भाषा बनाएं। हिंदी का महत्व किसी युग में कम नहीं हो सकता। काव्यगोष्ठी में रचनाओं के जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। डॉ. तेजिंदर ने पढ़ा- हे बंगला भाषा के वीरों, तुम संस्कृति के सच्चे हीरो...। सतपाल पाराशर आनंद ने उपवन में सुंदर खग प्यारे, गाएं निज भाषा में तारे पढ़कर तालियां बटोरीं। सतबीर जागलान ने कहा कि सांस-सांस में बसै ऐसे हिंदी, मेरे शरीर की जान सै हिंदी। डॉ. संध्या आर्य ने कहा कि भाषा की है क्या परिभाषा, कोई हमें समझे ये है आशा। राज बेमिसाल ने कहा कि हृदय से बह रही हो, हृदय में रह रही हो, हिंदी है मेरी भाषा, यही है मेरी अभिलाषा। मधु गोयल ने पढ़ा- जैसे बिंदी से माथे का मान रे, हिंदी भारत की आन बान शान रे। नीरू मेहता ने कहा- मैं खुशनसीब हूं मेरी मातृभाषा है हिंदी, मैं महफूज हूं, जब तक मेरी मां के माथे पर बिंदी। कृष्णा गोयल ने कहा कि आओ हिंदी भाषा को प्रणाम करें, मन से इसका सम्मान करें। गोष्ठी की अध्यक्षता चरखी दादरी से डॉ. अनीता भारद्वाज अर्णव ने की। कार्यक्रम का संचालन कैथल के साहित्यकार डॉ. प्रद्युम्न भल्ला ने किया।