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Kaithal News: श्री अंबकेश्वर मंदिर में पांच हजार साल से स्थापित है स्वयंभू शिवलिंग

Wed, 26 Feb 2025 12:31 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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संवाद न्यूज एजेंसी
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कैथल। प्राचीन श्री अंबकेश्वर मंदिर में लगभग पांच हजार साल से स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि मुगल काल में मोहम्मद गोरी की सेना ने हमला कर यहां शिवलिंग तोड़ने का प्रयास किया। प्रहारों के दौरान हुए चमत्कार से हमलावर भाग खड़े हुए। मान्यता है कि आज भी शिवलिंग पर प्रहारों के चिह्न देखे जा सकते हैं।

यहां महाशिवरात्रि पर मेला लगता है जबकि हर सोमवार को यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। इसकी विशेषता यह है कि यह शिवलिंग सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र रहा है और इसके साथ कई ऐतिहासिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं।
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बताते हैं कि मुगल आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी की सेना ने जब भारत पर आक्रमण किया, तब उन्होंने इस मंदिर पर भी हमला किया था। पहले शिवलिंग को बैल से बांधकर हाथियों से खींचने की कोशिश की गई, लेकिन वे असफल रहे। इसके बाद उन्होंने तेजधार हथियारों से प्रहार किए, जिससे शिवलिंग से द्रिव्य पदार्थ निकला, जो रक्त के समान प्रतीत हो रहा था। यह दृश्य देखकर हमलावर भयभीत होकर वहां से भाग खड़े हुए।

यहां पर महाशिवरात्रि और शिवरात्रि के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। हर सोमवार को भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर की मान्यताओं के कारण यह शिवालय सिर्फ कैथल ही नहीं,

बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी आस्था का प्रमुख केंद्र है।
पौराणिक मान्यताएं, इतिहास

मंदिर के पुजारी महंत प्रेमानंद पुरी ने कहा कि ऋषि-मुनि यह बताते थे ये मंदिर लगभग पांच हजार वर्ष पुराना है। यह पांडवों के समय का है। प्राचीन काल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार इसकी महत्ता को दर्शाता है। यहां महंत विश्वनाथ पुरी, महंत दयानंद पुरी आदि गद्दीनशीन रहे। अंबकेश्वर मंदिर में अंबिका (काली देवी) की भी प्रतिमा स्थापित है, जिससे इस मंदिर का नाम अंबकेश्वर पड़ा। अंबिका देवी की उपस्थिति इस स्थान को और भी अधिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व प्रदान करती है।

ंn कलायत नगर के निकट प्रकृति की गोद में स्थित खट्वांगेश्वर मंदिर अलौकिक होने के साथ साथ बाबा का जीवंत स्थान है। पुराणों में वर्णित इस स्थान का संबंध इक्ष्वाकु वंश में राजा राम से 14 पीढ़ी पूर्व राजा खट्वांग से है। देव दानव युद्ध में देवों की और से लड़ कर जीतने के बाद राज त्याग कर खट्वांग ने इसी स्थान पर महाकाल की उपासना की थी। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर महाकांत ने इस पर उनको खट्वांगेश्वर के नाम से जाना जाने का वरदान दिया था।
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मान्यता है कि इसी स्थान पर पहली बार महामृत्युंजय महामंत्र की रचना महर्षि मारकंडेय ने की थी। पंडित गोपाल वत्स ने बताया कि महर्षि मारकंडेय का जन्म छह किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव मटौर में हुआ था। अल्पायु के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए मारकंडेय इसी स्थान पर महामृत्युंजय महामंत्र का जाप करते हुए खटवांगेश्वर महादेव से लिपटे थे। इसके कारण से यम के दूत भी विवश होकर वापस चले गए। बे-चिराग नगरी के नाम से विख्यात गांव खंडालवा में स्थापित इस शिवलिंग का सीधा संबंध पाताल लोक से माना जाता है। पुजारी गोपाल वत्स ने बताया कि मंदिर में श्रावण व फाल्गुन मास की दोनों ही महाशिवरात्रि पर मेले का आयोजन होता है। श्रावण मास में हजारों की संख्या में कावडि़ये हरिद्वार से कावड़ लाकर यहां शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। फाल्गुन मास में कावडि़ये की संख्या तो कम होती है पर जल चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कमी नहीं आती।
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