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Kaithal News: लिंगानुपात सुधार से सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ किया संघर्ष

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स्वास्थ्यकर्मी बीरमती देवी
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अजय कुमार
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कसान। चुनौतियां जब हौसले के सामने छोटी पड़ जाएं तो व्यक्ति केवल अपना जीवन नहीं बदलता, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन जाता है। ऐसी ही कहानी स्वास्थ्यकर्मी बीरमती देवी की है। शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने स्वास्थ्य जागरूकता के साथ सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी लगातार संघर्ष किया और लोगों को जागरूक किया।
बीरमती देवी ने 13 जुलाई 1993 को मल्टी परपज हेल्थ वर्कर के रूप में सेवा शुरू की। करियर की शुरुआत मेवात के पुनहाना से हुई। वर्ष 1995 में कलायत सीएचसी में कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने गांव चौशाला में करीब 10 वर्ष तक सेवाएं दीं। इसके बाद क्योड़क, तितरम और कैलरम सहित कई गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ लोगों को जागरूक करने का काम जारी रखा। तितरम में उनके प्रयासों का असर लिंगानुपात पर भी दिखाई दिया। जागरूकता अभियानों के माध्यम से उन्होंने ग्रामीणों को बेटियों के महत्व और भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूक किया। उनके कार्यकाल के दौरान गांव का लिंगानुपात करीब 900-950 से बढ़कर 1000-1100 तक पहुंचा। वहीं कैलरम में भी करीब 10 वर्षों की सेवाओं के दौरान लिंगानुपात 950 से बढ़कर 1050 तक पहुंचा।
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बीरमती देवी बताती हैं कि यह बदलाव अकेले किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य टीम और ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है। उनकी जागरूकता का असर यह हुआ कि कई गांवों में बेटी के जन्म पर भी कुआं पूजन जैसी सकारात्मक परंपराएं शुरू हुईं। दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी उन्होंने अभियान चलाए। कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन को लेकर फैली भ्रांतियों के बीच उन्होंने ग्रामीणों को समझाकर टीकाकरण के लिए प्रेरित किया। विरोध की परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और लोगों का विश्वास जीतकर स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाया। वर्तमान में वह पिछले करीब दो वर्षों से गांव बात्ता के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सुपरवाइजर के रूप में सेवाएं दे रही हैं।
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