कैथल। गांव बाबा लदाना स्थित बाबा राजपुरी के जिस मठ में डकैती हुई, उस मठ की आस्था हरियाणा सहित पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, चंडीगढ़ और उत्तराखंड के श्रद्धालुओं से जुड़ी है। विदेशों से भी श्रद्धालु बाबा राजपुरी के मंदिर में दर्शन-पूजन करने आते हैं। दशहरे पर डेरे में विशाल मेला लगता है, जिसमें जिले के साथ-साथ अन्य स्थानों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। दूध, अनाज और प्रसाद के साथ बाबा राजपुरी की पूजा कर श्रद्धालु धन-धान्य और पशुधन में वृद्धि की कामना करते हैं।
मान्यता है कि बाबा राजपुरी के डेरे में पूजा करने से पशुधन में वृद्धि होती है और परिवार में खुशहाली आती है। बाबा राजपुरी को गायों से बेहद स्नेह था। अब डेरे की देखरेख महंत दूजपुरी कर रहे हैं। आज भी डेरे में सैकड़ों वर्ष पुराना जाल का पेड़ है। बाबा राजपुरी डेरे के 22वें महंत दूजपुरी ने बताया कि करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पहले गांव बाबा लदाना में एक बच्चे का जन्म हुआ, जो शैशव काल में ही महान योगी की तरह थे। उसकी आत्मलीनता देखते हुए परिजनों ने उसे अपना रास्ता चुनने की आजादी दी। जो बाद में बाबा राजपुरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। यहां स्थित डेरा बाबा राजपुरी स्वामी विवेकानंद के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरु महंत तोतापुरी महाराज की समाधि इसी डेरे में है।
बाबा बालक पुरी महाराज ने महा निर्वाणी अखाड़े का निर्माण करवाया, जो नागा साधुओं का पहला अखाड़ा माना जाता है। उन्होंने भी यहां पर तप किया था। अब तक डेरे में 22 महंत गद्दी पर रह चुके हैं। मान्यता है कि माता हिंगलाज आसोज माह की अष्टमी की रात को अब भी डेरे में बने मंदिर में आती हैं और जाल के पेड़ पर धागा बांधकर जाती हैं। उनके आगमन के बाद हवन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दशहरे के दिन मंदिर में लगे जाल के पेड़ पर बाबा राजपुरी और माता हिंगलाज की पूजा कर ध्वजा चढ़ाई जाती है। इसके बाद तीन दिन के मेले का शुभारंभ किया जाता है। मेले के दौरान दिन रात पूजा पाठ का कार्य होता है। श्रद्धालु समाधि पर दूध, घी और मक्खन चढ़ाते हैं।
महंत ने बताया कि मठ में पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जब यहां पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ी हो। ऐसे में मठ व साधुओं की सुरक्षा को देखते हुए यहां कर्मचारी तैनात किए जाने चाहिए।