संवाद न्यूज एजेंसी
गुहला चीका। खंड में धान की फसल की कटाई जोरों पर है। इसके बाद किसानों के सामने पराली के प्रबंधन की बड़ी चिंता खड़ी हो जाती है। सरकार ने फसल अवशेष जलाने पर रोक लगा दी है, लेकिन किसानों के पास पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त बेलर और सुपरसीडर मशीनों की कमी के कारण कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में किसानों ने मशीनों की संख्या बढ़ाने की मांग की है।
सरकार की ओर से पिछले एक वर्ष से फसल अवशेष जलाने वाले किसानों पर सख्ती बरती जा रही है। इसके चलते जिला प्रशासन की निगरानी में इन किसानों पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और रेड एंट्री की जा रही है। इससे प्रभावित किसान अगले दो वर्षों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसल नहीं बेच पाएंगे। गुहला खंड में धान की पराली प्रबंधन के लिए मात्र 30 बेलर मशीनें उपलब्ध हैं।
किसानों का कहना है कि यदि सरकार चाहती है कि धान की पराली न जले, तो बेलर मशीनों की संख्या बढ़ानी होगी ताकि समय पर पराली का प्रबंधन हो सके और गेहूं की बिजाई समय पर की जा सके।
किसानों ने बताया कि पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध मशीनें पर्याप्त नहीं हैं। इसके कारण छोटे और सीमांत किसान महंगी बेलर मशीनें नहीं खरीद सकते और फसल अवशेष जलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसके अलावा किसानों ने सरकार से पराली के लिए उचित मूल्य तय करने और बायोमास पावर प्लांट संचालकों से दरों में वृद्धि की भी मांग की है।
वर्तमान स्थिति : गुहला उपमंडल में पराली की गांठ बनाने वाली 44 छोटी बेलर, 12 बड़ी बेलर और 812 सुपरसीडर हैं। इससे फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाकर बिजाई की जा सकती है। वहीं, गांव कांगथली में धान की पराली से कई प्रकार के उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं। इनके पास 7 से 8 बेलर मशीनें हैं। इसके बावजूद मशीनों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता बनी हुई है।
सरकार को गांव स्तर पर पर्याप्त बेलर और अन्य पराली प्रबंधन मशीनें उपलब्ध करानी चाहिए। मशीनों के लिए सब्सिडी का भुगतान सीधे विक्रेताओं को किया जाना चाहिए। -अवतार सीड़ा, किसान, चीका
धान की कटाई के बाद गेहूं की बिजाई भी करनी होती है, लेकिन समय पर गांठ बनाने वाली मशीन या बेलर उपलब्ध नहीं होता। सरकार को सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। -जसपाल उर्फ पाली, किसान, गांव टटियाना
किसानों से अपील है कि वे जल्दबाजी न करें। गेहूं की बिजाई का अंतिम समय 25 नवंबर तक है, इसलिए इस बीच पराली प्रबंधन करें और आग न लगाएं। -डॉ. कंचन शर्मा, एसडीओ, कृषि एवं कल्याण विभाग, चीका