संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत/कैथल। आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में चले जाएंगे। इस अवधि को चतुर्मास कहा जाता है। इन चार महीनों तक सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्यों पर विराम रहेगा।
कपिल मुनि ज्योतिष केंद्र के प्रमुख पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि आषाढ़ में एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हर महीने दो एकादशी पड़ती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। पूरे वर्ष लगभग 24 एकादशी होती हैं।
पंडित शांडिल्य ने बताया कि यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, जबकि भगवान शिव का परिवार जाग्रत रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि नहीं किए जाते।
ढांड रोड स्थित शिव शक्ति धाम मंदिर के पुजारी पं. प्रेम शंकर शास्त्री ने कहा कि धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री हरि चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जाग्रत होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।
पंडित शांडिल्य ने बताया कि पंचांग के अनुसार इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि 5 जुलाई को सायं 6 बजकर 58 मिनट से आरंभ होगी और 6 जुलाई रविवार रात 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत रविवार को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस व्रत से जन्म-जन्मांतर के दोष समाप्त होते हैं, पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी व्रत विधि ः प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र पर पीले फूल, तुलसीदल और चंदन अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम, भगवद गीता या विष्णु पुराण का पाठ करें। व्रत रखें। सुबह द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें।