संवाद न्यूज एजेंसी
सीवन/कलायत। सीवन के ऋणमोचन तीर्थ पर कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगा। हवन के पश्चात लंगर बरताया। श्रद्धालुओं ने तीर्थ में व मंदिर में माथा टेककर दीपदान किया। उधर, कलायत में भी धूमधाम से पर्व मनाया गया। शाही स्नान के साथ कार्तिक स्नान का समापन हुआ।
लोगों का मानना है कि तीर्थ पर पूजा स्नान आदि कर मन से मांगी हर मुराद पूरी होती है। सीवन में ऋण मोचन व यमुनानगर के बिलासपुर में कपाल मोचन यह दोनों भाई हैं, जिनकी पूजा करने दूर दूर से लोग आते है। इन दोनों ही स्थानों पर भारी मेले लगते हैं। पांडवों ने भी पितृ ऋण मोचन तीर्थ पर स्नान भी किया था।
शुक्रवार को लगे इस मेले पर दुकानें सजी हुई थी। इसके अलावा बच्चों के लिए विशेष तौर पर झूले लगाए गए थे जहां पर बच्चे झूलों का आनंद ले रहे थे।
मेले में बच्चों व महिलाओं ने जम कर खरीददारी की। ममता तनेजा, अंजू, सोनिका, अंशू, पंकू रहेजा व अन्य ने बताया कि इस अवसर पर महिलाएं घर की सुख शांति के लिए व्रत रखती हैं। महिलाएं कार्तिक माह की सप्तमी पर घर से चूरी बना कर तीर्थ पर प्रसाद बांटती है व परिवार की सलामती की दुआ मांगी जाती है। खेतों में मिट्टी के ढेलों से कोठड़ियां बनाकर भी पूजा करती हैं। मंदिर में दीप दान किया जाता है।
उधर, कलायत के श्री कपिल मुनि धाम में भक्तों की भारी भीड़ जुटी। अल सुबह श्रद्धालुओं ने पवित्र तीर्थ में स्नान कर दीपदान किया और कार्तिक मास की कथा का श्रवण किया। कार्तिक के शुरू होने के साथ ही श्री कपिल मुनि मंदिर में इस माह की कथा सुनाने का कार्य भी शुरू हो जाता है। कृष्ण पक्ष की प्रथमा से शुरू होने वाली कथा का समापन इस माह की पूर्णिमा को शाही स्नान के साथ होता है।
मंदिर में कार्तिक मास की कथा पुजारी अनिरुद्ध गौतम द्वारा किया जा रहा है। कथा व्यास गौतम ने कहा कि यूं तो प्रत्येक माह का अपना महत्व है। कार्तिक माह में पौराणिक तीर्थ में स्नान करने का इसलिए विशेष महत्व है क्योंकि मान्यता है कि इस माह सभी देवी-देवता पौराणिक तीर्थ में वास करते हैं।
उन्होंने कहा कि कथा सुनने से भी अधिक तीर्थ में डुबकी लगाना माना जाता क्योंकि कहा जाता है कि इस तीर्थ में स्नान करने से गंगासागर जैसा पुण्य मिलता है। उन्होंने कहा कि इस माह में दीप का दान सबसे बड़ा दान माना जाता है। उन्होंने कहा कि पूरे माह तक व्रत रखने वाले व आसमान का तारा देखकर भोजन करने वाले श्रद्धालु भक्तों द्वारा आज कपिल तीर्थ में स्नान करने पर न केवल मोक्ष की प्राप्ति होती है बल्कि मनोकामना पूर्ण होती है। श्री कपिल मुनि जी ने जब अवतार लिया तो उस समय सतयुग समाप्त हो रहा था तथा त्रेता युग का आरंभ हो रहा था जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
श्री कपिल मुनि जी को श्रीमद्भागवत के अनुसार ही पंचम अवतार माना गया है। उन्होंने कहा कि कपिल मुनि जी ने अपनी माता देवहूति को सांख्य शास्त्र का ज्ञान दिया था जिसके कारण ही उन्हें ज्ञान का अवतार भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि महाराज कुरु ने इस तीर्थ को भी कुरुक्षेत्र की अपनी भूमि में शामिल किया जिसके चलते ही कुरुक्षेत्र की 48 कोस की परिधि में आने वाले इस तीर्थ का महत्व और भी बढ़ जाता है।