संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। जिले के प्रशिक्षक सरदार राजिंद्र सिंह को मुक्केबाजी का भीष्म पितामह भी कहा जाता है। वे पिछले लगभग 42 वर्षों से रिंग पर खिलाड़ियों को निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं और इनकी ओर से सिखाए गुर से जिले के कई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर विभिन्न पदक जीत कर विश्व पटल पर देश व कैथल का नाम चमका रहे हैं।
इन खिलाड़ियोंं में भीम अवार्डी मनोज बॉक्सर, अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज मनीषा मौण, लासू यादव, कीर्ति ढुल व अन्य कई खिलाड़ी शामिल हैं। इन खिलाड़ियों की सफलता की वजह से कोच राजिंद्र सिंह पूरे हरियाणा में चर्चित हैं।
10 मई 1956 को जन्मे कोच राजिंद्र सिंह ने बताया कि जब वे 1976 में पंजाब में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तो उस समय उनके बचपन के पक्के मित्र अजायब सिंह को खेलता देख उनके मन में मुक्केबाज बनने की जिज्ञासा पैदा हुई। और उन्हीं से उन्हें मुक्केबाजी की प्रेरणा मिली। उन दिनों कोई प्रशिक्षक नहीं होता था और न ही कोई खेल सुविधाएं थीं बल्कि उस समय बड़े सख्त दस्ताने होते थे जिनसे बड़ी चोट लगती थी और न ही कोई सुरक्षा कवच होते थे। मैदान पर यूं ही कठिन अभ्यास करते थे।
उन्होंने 1975 में ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी में स्वर्ण और 1976 में सीनियर नेशनल में रजत पदक जीता। इसके बाद एमए की शिक्षा प्राप्त कर 1977 में एनआईएस से कोचिंग ली और कोच बन गए। तभी से उनके मन में यह विचार आता रहा कि जिस प्रकार उन्हें कोई कोच नहीं मिला, उसी तरह भविष्य के खिलाड़ियों को बिना शुल्क कोचिंग देकर सफलता का मार्ग दिखाया जाए, ताकि वे मेहनत और लगन से खेलकर अपने देश व माता-पिता का नाम रोशन कर सकें और सरकारी नौकरी हासिल कर सकें।
उन्होंने बताया कि 15 अप्रैल 1983 से मुक्केबाजी के प्रशिक्षक के तौर पर गुरुग्राम से शुरुआत की थी। वर्ष 1990 में सिरसा और 1993 में कैथल तबादला हुआ और तब से वे यहीं पर निशुल्क सेवाएं दे रहे हैं। शुरुआत में मैदान पर सिर्फ पांच खिलाड़ी आते थे, लेकिन धीरे-धीरे मनोज कुमार, विक्रम ढुल जैसे खिलाडिय़ों के जुडऩे से संख्या बढ़ती गई और 2011 तक करीब 100 खिलाड़ी रोज़ आने लगे।
पहले समय में सुविधाएं सीमित थीं, वे कच्चा रिंग तैयार करते थे, चारों ओर सफेदा की लकड़ी के पोल और रस्सी से घेरा बनाते थे। लेकिन कठिन अभ्यास के चलते खिलाड़ियों ने सफलता हासिल की। राजिंद्र सिंह को 1989 और 1997 में राज्यपाल द्वारा बेस्ट कोच के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कार मिला।
वर्ष 2014 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने अपना समर्पण नहीं छोड़ा और आज भी सुबह-शाम मैदान में बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके प्रयासों से कई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं और सेना, रेलवे, शिक्षा विभाग, खेल विभाग और पुलिस में खेल कोटे से नौकरी प्राप्त कर चुके हैं। फिलहाल उनके पास लगभग 200 लडक़े और लड़कियां नियमित रूप से अभ्यास कर रहे हैं। वे निर्धन परिवारों के बच्चों को दूध, फल व पोषण सामग्री अपने खर्चे पर उपलब्ध कराते हैं। उनका सपना है कि हर बच्चा खेलों के माध्यम से अपने जीवन में सफल हो और अपने देश, समाज और परिवार का नाम रोशन करे।
राजिंद्र सिंह युवाओं को नशे से दूर रहने और बुरी संगति से बचने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि आज के दौर में यदि किसी युवा को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाना है, तो उसे शिक्षा के साथ-साथ किसी खेल में रुचि जरूर लेनी चाहिए। खेलों से न केवल शारीरिक और मानसिक विकास होता है, बल्कि यह सरकारी नौकरी और पहचान का मार्ग भी खोलता है। सरकार भी अच्छे खिलाडिय़ों को नकद इनाम और खेल कोटे से नौकरियों का अवसर दे रही है। इसलिए खेलों को अपनाएं, अनुशासन में रहें और देश का गौरव बनें।