राजिंद्र तंवर
कैथल। गतका एक पारंपरिक भारतीय युद्ध कला है जो विशेष रूप से सिख समुदाय के साथ जुड़ी हुई है। इसका इतिहास सिख धर्म और संस्कृति के शुरुआती काल से जुड़ा हुआ है। यह युद्धकला न केवल आत्मरक्षा का माध्यम है, बल्कि सिख धर्म में आध्यात्मिकता और अनुशासन का भी प्रतीक है। यह कला विशेष रूप से तलवारबाजी और शारीरिक कौशल पर आधारित थी।
यह बात भाई उदय सिंह गतका अखाड़ा के कोच कोच दीदार सिंह ने कही। उन्होंने बताया कि यह कला गुरु नानक देव जी के समय से प्रचलित है। इसे सिख धर्म में औपचारिक रूप से गुरु हरगोबिंद साहिब, छठे गुरु ने बढ़ावा दिया। उन्होंने सिखों को शारीरिक और आत्मिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणा दी।
उन्होंने बताया कि श्री गुरु गोबिंद सिंह 10वें गुरु ने सिखों को संत सिपाही संत और योद्धा बनने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गतका केवल युद्धकला नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। यह खेल शारीरिक फिटनेस, तेज सोच, और मानसिक दृढ़ता को बढ़ावा देता है।
उन्होंने बताया कि अब गतका राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेला जा रहा है। इस समय में यह कला, खेल और सांस्कृतिक प्रदर्शन के रूप में जीवित है।
कोच दीदार सिंह ने बताया कि पिछले लगभग 40 वर्षों से नीम साहब गुरुद्वारे में गतका खेला जा रहा है। शुरुआत में गतका के कोच बाबा सिंह रहे। उनके नेतृत्व में गतका नगर कीर्तनों सहित सिखों के अन्य आयोजनों में जाता है। जिसमें सदस्यों की ओर से अनूठा प्रदर्शन दिखाया जाता हैं, जिसे देख लोग हैरान हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि जब वे 12 वर्ष की आयु के थे तो एक नगर कीर्तन में गतका प्रदर्शन देखा। सदस्यों के अनोखे करतब देखकर वह बहुत प्रभावित हुए थे।
बाबा सिंह ने छोटी आयु में अपने बड़े भाई के साथ गतका खेलना शुरू कर दिया फिर धीरे-धीरे वही डोगरा गेट स्थित सिखों वाली गली के बच्चों के साथ मिलकर गतका खेलने लगे। वहीं इस समय भाई उदय सिंह गतका अखाड़ा में आठ से 40 आयु के लगभग 50 सदस्य गतका खेलते हैं।
वहीं अन्य खिलाड़ी भी विभिन्न खेलों में भाग लेकर कई पदक जीत चुके हैं। सभी प्रतिभागी सुबह दो व शाम को तीन घंटे नीम साहिब गुरुद्वारे में कठिन अभ्यास करते हैं। खेल प्रतियोगिताओं के साथ वे गुरुद्वारों के आयोजनों में गतका प्रदर्शन दिखाते हैं। कुछ वर्ष पहले कैथल में हुई राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में हमारे कई खिलाड़ियों ने भाग लेकर रजत व कांस्य पदक जीते हैं।
अखाड़ा के सदस्य कई महीनों पहले यमुना नगर में खेलने गए थे जिसमें केवल नौ मिनट में प्रतिभागियों ने 30 कलाएं दिखाई थी ओर हैरतअंगेज करतब दिखाए थे। गतका संगठन के सभी खिलाड़ियों का सपना है कि वे खेलो इंडिया व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले और पदक जीतकर देश व माता-पिता का नाम रोशन करें। संवाद
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जश्न सिंह 19 वर्षीय राज्यस्तरीय गतका खिलाड़ी हैं। वे गुरुद्वारे में पिछले 10 वर्ष से सुबह शाम अभ्यास करते हैं और खेलो इंडिया प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं।
n करदीप सिंह 17 वर्षीय राज्यस्तरीय गतका खिलाड़ी हैं। वे गुरुद्वारे में पिछले पांच वर्ष से सुबह-शाम अभ्यास करते हैं। वह खेलो इंडिया प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं।
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अरमान सिंह 16 वर्षीय राज्यस्तरीय गतका खिलाड़ी हैं वे गुरुद्वारे में पिछले पांच वर्ष से सुबह शाम अभ्यास करते हैं। वे खेलों इंडिया प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं।
n गुरजोत सिंह 18 वर्षीय गतका खिलाड़ी हैं। वे गुरुद्वारे में पिछले पांच वर्ष से सुबह शाम अभ्यास कर रहे हैं।
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मनप्रीत सिंह 12 वर्षीय गतका खिलाड़ी हैं। वे गुरुद्वारे में पिछले पांच वर्ष से सुबह शाम अभ्यास कर रहे हैं।
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गुरविंद्र सिंह 27 वर्षीय राज्य स्तरीय गतका खिलाड़ी हैं। वे गुरुद्वारे में आठ वर्ष से सुबह शाम अभ्यास करते हैं और राज्य स्तर प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं।
गतका में इस्तेमाल किए जाने वाले कई तरह के पारंपरिक हथियार हैं। किरपान (घुमावदार तलवार), चक्कर (गोलाकार छल्ला), खांडी (दोधारी तलवार), और ढाल (ढाल), आदि। अभ्यास के भीतर प्रत्येक हथियार की विशिष्ट विशेषताएं और महत्व होता है।
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लघु अस्त्र- खंजर, कृपाण, छोटी तलवार।
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दीर्घ अस्त्र- तलवार, भाला, लाठी।
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लचीले अस्त्र - चेन, कमान, चकरी।
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फेंकने वाले अस्त्र - तीर-कमान, भाले।
इनके अलावा गतका में बिना हथियार वाले हाथों और शरीर की तकनीक भी महत्वपूर्ण होती है। यह कला आत्मरक्षा और शारीरिक संतुलन सिखाने के लिए प्रसिद्ध है।