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किसान आंदोलन में जिले के 10 किसानों की गई जान

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भले ही तीन कृषि कानून वापस हो गए, लेकिन किसान आंदोलन जिले के किसानों को कई बड़े घाव दे गया। आंदोलन के दौरान जिले के 10 किसानों को जान गंवानी पड़ी। ये सभी किसान जिले के विभिन्न गांवों से किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली में दिए जा रहे धरने में शामिल होने के लिए गए हुए थे। किसी की दिल्ली में दिए जा रहे धरने पर बीमारी के कारण मृत्यु हुई तो कोई सामान ले जाते समय दुर्घटना का शिकार हो गया। आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले जिले के किसानों में युवा और बुजुर्गों के नाम भी शामिल हैं। इसके अलावा जिले के दो अलग-अलग गांवों से आंदोलन के दौरान दो युवा किसान दुर्घटनाओं का शिकार हो गए।
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आंदोलन के दौरान इन किसानों की गई जान-
1. सबसे पहले गांव मस्तगढ़ निवासी 18 वर्षीय किसान जसप्रीत की जान गई। यह किसान दिल्ली में चल रहे आंदोलन में शामिल होने के लिए सामान सहित गाड़ी में दिल्ली जा रहा था। इस दौरान करनाल के पास गाड़ी नहर में डूब गई थी, जिससे किसान की मौत हो गई।
2. दूसरी जान गांव सेरधा निवासी अमरपाल को गंवानी पड़ी। टिकरी बॉर्डर पर यह किसान धरने में शामिल होने के लिए ट्रैक्टर में दिल्ली गया था। वहां हृदय गति रुकने से किसान का निधन हो गया। जिसके बाद किसान संगठनों द्वारा ट्रैक्टर-ट्रालियों में कैथल लाया गया।
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3. तीसरा गांव भाणा निवासी किसान रामकुमार रहा। रामकुमार की मौत भी दिल्ली में चल रहे धरने पर हुई। दिमाग की नस फटने से किसान की जान गई। मौत के बाद किसान का गांव में लाकर अंतिम संस्कार करवाया गया।
4. चौथी मौत गांव किठाना निवासी किसान ठंडिया राम की हुई। यह किसान बीती सर्दियों में ठंड के कारण मौत का शिकार हुआ। आंदोलन में शामिल होने के लिए किसान दिल्ली गया हुआ था।
5. आंदोलन में जान गंवाने वाला पांचवां किसान गांव भाणा निवासी बलदेव सिंह रहा। दिल्ली में किसान की मौत हुई। वहां से गांव में लाकर किसान का अंतिम संस्कार किया गया।
6. छठवीं मौत गांव पाई के किसान अजय ढुल की हुई। आंदोलन के दौरान एक सडक़ दुर्घटना में अजय की मौत हो गई। इनकी भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही।
7. सातवीं मौत गांव जुलानी खेड़ा के किसान दलीप सिंह की हुई। यह किसान धरने में शामिल होने के लिए दिल्ली गया हुआ था। अन्य किसानों के साथ काफी दिनों से टिकरी बॉर्डर पर ही रुका हुआ था।
8. आठवां जान गंवाने वाला किसान गांव बड़सीकरी निवासी दिलबाग सिंह रहा। यह किसान टिकरी बॉर्डर पर गया था, जहां उसकी मौत हो गई।
9. नौवीं मौत किसान धीरराम राविश की हुई। यह किसान भी टिकरी बॉर्डर पर ही गया था। काफी दिन से अन्य किसानों के साथ धरने पर डटा हुआ था।
10. 10 वीं मौत गांव भागल निवासी बुजुर्ग किसान मेवा राम पूनिया की हुई। यह किसान दिल्ली में कुंडली बॉर्डर पर दिए जा रहे धरने में शामिल था। वहां किसान की हृदय गति रुकने से मौत हो गई।
एक किसान कोमा में है तो दूसरे की रीढ़ की हड्डी टूटी थी
एक किसान गांव भाणा का निवासी दीपक नाथ है, जो दुर्घटना के दौरान कोमा में चला गया। अब तक युवा कोमा से बाहर नहीं आ सका है। दूसरा किसान गांव रोहेड़ियां निवासी प्रदीप है, जिसकी दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। अभी तक किसान दोबारा सामान्य स्थिति में नहीं आ पाया है।
किसान नेता बोले- अभी समाप्त नहीं हुआ आंदोलन, संसद में स्वीकृति मिलने के बाद ही लौटेंगे घरों को -
किसान संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है। भाकियू चढूनी समूह के जिला प्रधान होशियार गिल प्यौदा ने कहा कि वे आंदोलन को तभी खत्म करेंगे, जब संसद में कानूनों को वापस लेने पर स्वीकृति मिल जाएगी। इसके अलावा एमएसपी की गारंटी मिल जाएगी। जब तक यह कार्य नहीं होगा, तब तक किसान धरने व प्रदर्शन जारी रखेंगे।
भाकियू चढूनी समूह के युवा प्रदेशाध्यक्ष विक्रम कसाना ने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा आंदोलन के संबंध में जो निर्देश जारी करेगा, उनका पालन किया जाएगा। अगर सरकार अपनी घोषणा को संसद में स्वीकार करेगी, कानून वापस लेगी और एमएसपी पर किसानों के हक में फैसला लेगी, तभी किसान धरने को समाप्त करेंगे और अपने घरों को लौटेंगे। मोर्चे के आगामी निर्देशों तक आंदोलन पहले की तरह ही जारी रहेगा।
किसान नेता महावीर चहल नरड़ ने कहा कि आंदोलन के दौरान किसानों को काफी दिक्कतें उठानी पड़ी, लेकिन फिर भी वे अपने हकों के लिए संघर्ष करते रहे। अब जो भी निर्देश संयुक्त किसान मोर्चा जारी करेगा, उसी के अनुसार आगामी निर्णय लिया जाएगा। आंदोलन संबंधित आगामी निर्णय किसानों संगठनों द्वारा बैठकों के माध्यम से लिए जाएंगे।
युवा किसान नेता मंजीत करोड़ा ने कहा कि 29 नवंबर से संसदीय सत्र चलेगा, वहीं पर कृषि कानूनों को लेकर अंतिम निर्णय होगा। सरकार ने कानूनों को वापस लेने की घोषणा तो कर दी है, लेकिन एमएसपी पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। सरकार को चाहिए कि इस पर तुरंत निर्णय ले और आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज हुए केस भी वापस ले।
फोटो संख्या-20
किसान नेताओं ने बैठक कर बांटे लड्डू
कैथल। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर कैथल के किसान नेताओं ने एक बैठक की। इसकी अध्यक्षता भरत सिंह बैनीवाल ने की। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा को किसान, मजदूर व आम जनता की एकता की जीत बताया है। साथ ही लड्डू बांटकर खुशी का इजहार किया।
उन्होंने कहा कि लगभग एक वर्ष के संघर्ष के बाद आखिर केंद्र सरकार व प्रधानमंत्री को कृषि कानून लेने की घोषणा करनी ही पड़ी। उन्होंने कहा अच्छा होता अगर प्रधानमंत्री घोषणा से पहले संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं से बातचीत कर खेती कानूनों के साथ-साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी कानून, बिजली बिल वापसी, किसानों पर दर्ज अनगिनत मुकदमे रद्द करने पर निर्णय लेकर घोषणा करते। संयुक्त किसान मोर्चा कैथल राष्ट्रीय संयुक्त किसान मोर्चा के निर्देशानुसार आगामी दिशा-निर्देर्शों का पालन करेगा। इस अवसर पर अनिल नंबरदार, रामफल नौच, रामफल भानपुरा, मास्टर राम किशन, बलवंत जाटान, सुरजीत बैनीवाल, मास्टर राम चन्द्र मोर, नरसी ढुल, मास्टर लख्मी चंद, रतन लाल शर्मा, राज पाल कुंडू, मोहकम सिंह, जगदीश मलिक, महावीर राविश, सोहन सिंह पुनिया मौजूद थे।
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