सब्जियों के रेट लगातार बढ़ रहे हैं। इससे लोगों की जेब ढीली हो रही है। हालांकि किसान मंडी में जो सब्जी बेचता है, वह काफी सस्ती होती है, लेकिन ग्राहक तक पहुंचे-पहुंचे इसकी कीमत दोगुनी हो जाती है। सब्जी मंडी के मांसाखोरों (खुदरा व्यापारियों) की माने तो वे भी खास मुनाफा नहीं लेते। एक किलोग्राम सब्जी पर दो से पांच रुपये तक लाभ मिल पाता है। हालांकि इसमें मंडी में कमीशन व चुंगी के नाम पर ली जाने वाली फीस भी महंगाई बढ़ा रही है।
सब्जियों के बढ़ते दामों को लेकर अमर उजाला ने बुधवार को जांच की। इसमें पाया कि किसान जो सब्जी मंडी में बेचता है, ग्राहक को उससे दोगुनी कीमत पर मिल रही है। हालांकि फिलहाल 70 प्रतिशत सब्जी बाहर से आ रही है। इसमें किराया महंगा होने के कारण कीमत बढ़ रही है। वहीं उत्पादन कम होने के कारण भी इस बार सब्जी की कीमत अधिक है।
स्थानीय सब्जी का अभाव
सब्जी मंडी में फड़ पर सब्जी बेचने वाले प्रताप सिंह के अनुसार पिछले साल ईक्कस गांव की गाजर की आवक काफी अधिक थी। इसके चलते थोक रेट काफी कम थे। ग्राहक को पांच रुपये प्रति किलोग्राम तक गाजर मिल रही थी, लेकिन इस बार स्थानीय गाजर 30 प्रतिशत भी नहीं है। इसके चलते महंगी मिल रही है।
यूं होता है सब्जी का व्यापार
सब्जी उत्पादक किसान महेंद्र सिंह व करण सिंह के अनुसार किसान अपने नग बनाकर मंडी में ले जाता है। यहां सब्जि की बोली लगती है। यदि किसान को भाव उचित लगता है तो वह सब्जी बेचता है और कम भाव लगने पर नहीं भी बेचता। किसान से बड़े व्यापारी सब्जी खरीदते हैं। इनमें मंडी के मांसाखोर व अन्य दुकानदार भी शामिल हैं। यहां से या तो ग्राहक सीधे घर के लिए सब्जी खरीदता है, या फिर छोटे दुकानदार सब्जी लेते हैं।
ऐसे समझे कीमत का गणित
सब्जी उत्पादक किसान कर्ण सिंह के अनुसार वीरवार को उसकी पत्तागोभ मंडी में 11 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकी। इस पर व्यापारी या मांसाखोर ने यह सब्जी लेकर इसे गुणवत्ता के हिसाब से 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम बेचा। छोटे दुकानदार इस सब्जी को 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम बेचते हैं।
देना पड़ता है कमीशन
मांसाखोर प्रताप व सतबीर के अनुसार जब वे आढ़ती से सब्जी खरीदते हैं तो उन्हें आठ प्रतिशत कमीशन देना पड़ता है। इसके अलावा पांच रुपये प्रति नग चुंगी ली जाती है। 100 रुपये की सब्जी का एक नग खरीदने पर 13 रुपये अतिरिक्त खर्च आ जाता है। इसके बाद सब्जी की छंटाई करने पर इसमें कुछ सब्जी निम्न गुणवत्ता की भी निकलती है। इसके हिसाब से ही प्रति किलोग्राम पांच रुपये तक मुनाफा तय किया जाता है। वहीं पालक मांसाखोर को छह से सात रुपये की एक गुच्छी पड़ रही है। इसे वह दस रुपये में बचेता है। मेथी की गुच्छी 10 से 11 रुपये की मिलती है, जो 15 रुपये में बेची जाती है।
शिकायत मिलने पर करेंगे कार्रवाई
सरकार ने मंडी में फीस समाप्त की हुई है। इसके बावजूद यदि कोई आढ़ती फीस लेता है तो यह गलत है। इसकी शिकायत करें, तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
संजीव कुमार, सचिव मार्केट कमेटी, जींद।
सरकार ने बंद की है मंडी फीस
सरकार ने सिर्फ तीन प्रतिशत मंडी फीस बंद की है। आठ प्रतिशत कमीशन है और यह लिया जाता है। यह बंद नहीं किया गया है। इसके अलावा जिसे मांसाखोर चुंगी बता रहे हैं, वह बारदाना चार्ज हैं। आढ़ती कट्टे या कैरेट में सामान देता है। यह तीन-चार दिन में वापस मिलती है। कट्टा देता है। यहां तक की 25 किलोग्राम सामान का पॉलीथिन भी पांच रुपये से कम नहीं आता। इसके पांच रुपये प्रति नग लिए जाते हैं।
अवतार कुमरा, प्रधान, सब्जी मंडी।