जींद। जब भी कारगिल युद्ध का जिक्र आता है बरसोला गांव के सूबेदार मेजर जयपाल सिंह का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। वे बताते हैं उन्होंने अपने परिवार से कारगिल युद्ध में जाने की बात छिपा ली थी। एनसीसी के किसी हवलदार ने पत्नी को यह बात बताई। इसके बाद घर से चिट्ठी आई। इसमें भाई ने लिखा था- अगर लड़ाई में गोली खानी पड़े तो सीने में खाना, पीठ पर नहीं।
सूबेदार मेजर जयपाल बताते हैं कारगिल युद्ध के समय उन्होंने 17 जाट रेजिमेंट में मोबाइल फायर सिस्टम की अगुवाई की थी। वे बताते हैं उस समय तीन दिन में ही चिट्ठी घर पहुंच जाती थी। उन्होंने परिजनों से इसलिए युद्ध में जाने की बात छिपाई थी ताकि वे चिंता न करें। परिवार को जब मोर्चे पर डटने की जानकारी मिली तो भाई ने चिट्ठी भेजकर हौसला अफजाई की थी।
पता नहीं था युद्ध पाक सेना से या आतंकवादियों से
सूबेदार मेजर जयपाल बताते हैं 22 मई 1999 को उनकी रेजिमेंट नौगांव के होशियारपुर में थी। तभी संदेश आया कि कारगिल कूच करना है। इसके बाद रेजिमेंट 23 मई को सोनद्वार पहुंच गई और 24 मई को मस्को गांव पहुंची। इसके बाद उनकी रेजिमेंट ने पाकिस्तान के कब्जे में जो सबसे ऊंची पहाड़ी थी उस पर कूच शुरू की। तब तक किसी को पता नहीं था कि यह लड़ाई आतंकवादियों से है या पाकिस्तानी सेना से। उनकी रेजिमेंट के पास संदेश आया था कि कुछ आतंकवादी देश की सीमा में छिपकर बैठ हैं और उनके कब्जे से एरिया खाली करवाना है।
जाट रेजिमेंट ने 4540 मीटर ऊंचाई पर फहराया था तिरंगा
29 मई को 17 जाट रेजिमेंट ने दुश्मन को हराकर 4540 मीटर ऊंची पहाड़ी पर तिरंगा फहराया था। पूरे कूच में रेजिमेंट ने 10 हजार राउंड फायरिंग की थी। इसमें काफी पाकिस्तानी सैनिकों को जवानों ने बीच रास्ते में मार गिराया था। इसी रेजिमेंट में जींद जिले के 11 जवान शामिल थे।