डीके भारद्वाज कारगिल युद्व के समझौते के दौरान
- फोटो : संवाद
भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद रिटायर हुए जींद निवासी कर्नल डीके भारद्वाज एक जनवरी 1972 को वह सेना में भर्ती हुए और 20 नवंबर 2009 को वह सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने कारगिल का युद्ध न केवल बहुत नजदीक से देखा बल्कि इसमें महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। कारगिल युद्ध के समापन पर भारत और पाकिस्तान के बीच जब समझौता हुआ तो भारतीय सेना की तरफ से जिन अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए उन अधिकारियों में कर्नल डीके भारद्वाज भी शामिल थे।
उन्होंने बताया कि कारगिल में जब लड़ाई हुई तो मानव शक्ति का काफी महत्व था। इसमें 102 मीडियम रेजिमेंट के साथ बोफोर्स गन का भी योगदान रहा। इसी यूनिट को कारगिल फतह का तमगा भी मिला था। इस लड़ाई में उनको आर्मी इंटेलिजेंट हेड बनाकर भेजा गया था।
शुरुआत में उनके पास फौज कम होने के कारण कामयाबी नहीं मिली लेकिन बाद में ज्यादा फौज मंगवाई गई और बोफोर्स गन को टुकड़ों में खोलकर भेजा गया। तैयार गन को भेजने की सुविधा नहीं थी। इसके बाद इनको लड़ाई के दौरान ही जोड़ा गया। यह गन इस लड़ाई की जीत का मुख्य हिस्सा था।
इन गन के दम पर जुलाई के पहले सप्ताह में लड़ाई काबू आई और 24 जुलाई को कामयाबी मिली। पाक ने जितनी जमीन पर कब्जा लिया था उनको वहां से वापस खदेड़ा। इसके बाद समझौते की रूपरेखा तैयार की गई। इसके लिए डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल अनिल विज, बिग्रेडियर आरके बत्रा 24 जुलाई को दिल्ली में आए।
इसके बाद बाघा बार्डर पर सहमति के लिए बात शुरू की। 25 जुलाई को सहमति के ड्राफ्ट मंजूर हुए। 26 जुलाई को ऑपरेशन रूम तैयार किया गया। पाक की तरफ से इसमें पाक डीजीएमओ लेफ्टिनेंट अजगर खान, कर्नल लियाकत अलि टूर व मेजर नजीर आए। फाइनल समझौते के दौरान उनके बीच काफी बहस भी हुई लेकिन बाद में दोनों की तरफ से समझौते पर हस्ताक्षर कर सीज फायर कर दिया गया।