जींद। महिलाओं की बढ़ती उम्र में गर्भाधारण डाउन सिंड्रोम के खतरे को बढ़ा देता है। ऐसे में लोगों को इसके बारे में जागरूक होना जरूरी है। यह बात मनोचिकित्सक डॉ. दीपक कुमार ने अपने संबोधन में कही। वह दर्पण कम्युनिकेशन सोसायटी के दर्पण रिहेबिलिटेशन सेंटर एवं स्पेशल स्कूल में शुक्रवार को आयोजित विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस कार्यक्रम में पहुंचे थे। सोसाइटी अध्यक्ष श्रीभगवान राणा ने बताया कि दिव्यांग बच्चों ने पेंटिंग प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
मनोचिकित्सक डॉ. दीपक ने कहा डाउन सिंड्रोम शरीर की रचना में बना एक आनुवंशिक विकार है, जिससे बौद्धिक क्षमता और शारीरिक विकास पर बहुत असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि डाउन सिंड्रोम तब होता है, जब किसी व्यक्ति के पास क्रोमोसोम 21 की अतिरिक्त कॉपी या आंशिक कॉपी होती है। ऐसे लोगों का आईक्यू मध्यम या निम्न श्रेणी का हो जाता है। डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे बोलने में भी काफी धीमे होते हैं। डाउन सिंड्रोम वाले लोगों के शरीर की बनावट अलग तरह की होती है, ऐसे लोगों में छोटी नाक या चपटी नाक, कान का आकार असामान्य होना जैसे कई लक्षण हैं। पेंटिग प्रतियोगिता में ज्योति प्रथम, गुलाब द्वितीय और समीक्षा तीसरे स्थान पर रही। इस अवसर पर डॉ. राजेश्वर, डॉ. आशुतोष, जयपाल, जगदीश, कोर्स कोऑर्डिनेटर अमित, लेक्चरर दीप्ति, मीनू शर्मा, रवित बधवार, मनो वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार, विशेष शिक्षक प्रमोद ,भारती, काजल, सुनैना, सुमित, राजरानी, नवनीत कौर, सतविंदर सिंह मौजूद रहे।
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विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस एक वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम
संस्थान निदेशक डॉ. आशुतोष ने कहा कि विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस एक वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम है जो हर साल 21 मार्च को जागरूकता बढ़ाने और परिवार के समर्थन में आवाज उठाने के लिए मनाया जाता है। प्राचार्य सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम वाले लोगों की मानसिक व शारीरिक विकास की निगरानी के साथ-साथ उनकी फिजियोथेरेपी, नियमित कंसल्टेंसी और विशेष शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है।