जींद। नवरात्रे के चौथे दिन रविवार को श्रद्धालुओं ने मां चंद्रघंटा की पूजा की। शहर के जयंती देवी मंदिर, भूतेश्वर मंदिर, श्री सोमनाथ मंशा देवी मंदिर, वैष्णवी धाम में मां के भक्तों की भीड़ लगी रही।
जयंती देवी मंंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने तीसरे नवरात्रे के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि तीसरे दिन मां चंद्रघंटा देवी की आराधना ध्यान-मंत्र, जप से किया जाता है। यह महादुर्गा की तीसरी शक्ति हैं। चंद्रघंटा शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है। चंद्र: घंटायां यस्या: सा इति चंद्रघंटा अर्थात जिसके घंटा में चंद्रमा स्थित है, वही देवी चंद्रघंटा नाम से जगत में विख्यात हैं। दूसरा अर्थ यह है कि जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्ध चंद्रमा सुशोभित है वही चंद्रघंटा देवी हैं।
उन्होंने कहा कि मां आ आशीर्वाद पाना है तो हृदय में चाहत पैदा करो। वह चाह आग बन जाए। मां की चाह जब उमड़ कर आग बन जाती है तब अन्य समस्त चाहों को जला डालती है। यदि जला नहीं पाती तो समझ लेना कि मां की चाह ही नहीं है। माता वैष्णवी धाम के आचार्य पवन शर्मा ने कहा कि जर्रे-जर्रे में है मां का वास। वही हैं सबकी सृजनहार, वही हैं सबकी पालनहार, वही हैं सबकी तारनहार। वही हैं सबके हृदय की धड़कन, वही ऊर्जा के रूप में पूरे शरीर में प्रवाहित हो रही हैं। जब वही सबकुछ कर रही हैं तो फिर ईर्ष्या किससे। नफरत किससे। अतः मां के विराट स्वरूप से प्यार करो। उसी को चाहो। उसी के बन जाओ। आचार्य पवन शर्मा नवार्ण महायज्ञ के दौरान प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि मां से प्यार करने का अर्थ है मां के बनाए हुए बंदों से प्रेम करना। यदि कोई मनुष्य यह कहे कि मैं अपने पड़ोसी से तो घृणा करता हूं, लेकिन ईश्वर से प्रेम करता हूं तो वह झूठा है। उन्होंने कहा कि जो प्राणी मंदिर में तो मां की मूर्ति की पूजा करता है, लेकिन घट-घट वासी मां की उपेक्षा करता है तो उसकी वह भक्ति दिखावा है, छलावा है।