कौन कहता है आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। कवि दुष्यंत की ये पंक्तियां हर किसी के हौसले को सलाम करती हैं। विकट परिस्थितियों से जहां लोग हार मान कर अपना रास्ता ही बदल देते हैं, ऐसे में बांगर की बेटी गुरमेल कौर ने बहाव के विपरीत तैर कर मंजिल पाने की प्रेरणा देश भर की बेटियों को दी है।
गुरमेल कौर को सिरसा के शाह सतनाम कन्या स्कूल की हैंडबाल टीम में सिर्फ खिलाड़ियों की संख्या पूरी करने के लिए शामिल किया गया, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर न सिर्फ देश की टीम में जगह बनाई, एशियन और सार्क खेलों में देश का मान भी बढ़ाया। मूल रूप से पंजाब सीमा से सटे धनौरी गांव में जन्मी गुरमेल कौर के तीन और बहनें और एक भाई है। दो बड़ी बहन होने के कारण परिजनों ने उसे लालन पालन के लिए उसके ननिहाल में कलोदा गांव में छोड़ दिया। यहां खेल का वातावरण मिला और गुरमेल कौर ने खुद को एक एथलीट के तौर पर तराशना शुरू कर दिया। पांचवीं कक्षा के बाद उसे पढ़ने के लिए सिरसा के शाह सतनाम कन्या स्कूल में भेजा गया। गुरमेल को एथलेटिक्स में ही रुचि रही और वह 100 मीटर दौड़ में चैंपियन रही। इसी दौरान जिंदगी में एक मोड़ आया और गुरमेल हैंडबॉल के कोर्ट में पहुंच गईं।
गुरमेल के अनुसार जब वह आठवीं कक्षा में थी, स्कूल की लड़कियों की हैंडबाल टीम पूरी नहीं हो रही थी। ऐसे में अच्छी धावक होने के नाते सिर्फ टीम पूरी करने के लिए उसका चयन किया गया। हैंडबाल में लेफ्ट हैंड रिंग पोजिशन में गुरमेल के हाथ देखकर न सिर्फ स्कूल, राज्य के खेल अधिकारी भी दंग रह गए। इसी मैच से उनका चयन राज्य कैंप के लिए हो गया। महज 16 साल की उम्र में राष्ट्रीय सीनियर प्रतियोगिता में खेलने वाली गुरमेल अकेली खिलाड़ी हैं। इसके बाद गुरमेल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और परिणाम स्वरूप इस बार उनके प्रदर्शन के आधार पर सरकार ने उन्हें भीम अवार्ड से नवाजा है।
आसान नहीं रही खेल की राह
गुरमेल के अनुसार बेशक उसके नाना, मामा, पिता और मां पूरा सहयोग कर रहे थे, लेकिन रिश्तेदारों और पड़ोसियों को यह हजम नहीं हो रहा था। उनको रोकने के लिए काफी प्रयास हुए, लेकिन परिजनों की सपोर्ट से गुरमेल आगे बढ़ती रही। फिलहाल गुरमेल कौर चौधरी रणबीर सिंह विवि में एमएड की छात्रा हैं।
गांवों की लड़कियों को मिले मौका
गांवों में प्रतिभा भरी पड़ी है। बहुत अच्छा लगता है, जब कहीं भी उनके कारण उनके गांव का नाम लिया जाता है। गांव का कोई भी लड़का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने गांव के नाम को पहचान नहीं दिलवा पाया, लेकिन मैंने यह किया है। इसकी बहुत अधिक खुशी है। गांवों की लड़कियों के लिए प्रेरणा बनकर उनको आगे बढ़ा पाई तो बहुत खुशी होगी। -गुरमेल कौर, भारतीय हैंडबाल खिलाड़ी।