03जेएनडी37-साइकिल चलाते हुए सुभाष तितरम। स्त्रोत स्वयं
जींद। सुभाष तितरम ने साइकिल व व्यायाम से कैंसर को मात देकर लोगों के सामने मुश्किल हालात में हौसला नहीं हारने का उदाहरण पेश किया है। हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी 58 वर्षीय सुभाष तितरम ने बताया कि वह हरियाणा पुलिस में एएसआई से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें बड़ी आंत में कैंसर था। 2010 में उन्हें जब कैंसर का पता चला तो रोहतक पीजीआई के डॉक्टर ने कहा था कि मुश्किल से चार महीने की जिंदगी बची है। सुभाष ने अपने हौसले से कैंसर को मात दे रखी है। हर रोज वह 20 से 30 किलोमीटर तक साइकिल चलाते हैं।
उन्होंने बताया कि वह बिना रुके 100 किलोमीटर तक साइकिल चला सकते हैं। इसके अलावा हर्बल पार्क में ग्राउंड पर सुबह-शाम व्यायाम चलाते हैं। 2010 में जब वह बीमार हुए तो चार महीने तक चिकित्सकों के चक्कर काटते रहे। किसी ने टीबी बताई तो कोई एपेंडिक्स कहता रहा। आखिर में जब पीजीआई में जांच करवाई तो पता चला कि बड़ी आंत में कैंसर है। जब वह रिपोर्ट लेने गए तो चिकित्सक ने उनका हौसला देखकर समझा कि वह मरीज के साथ आए हैं। डॉक्टर ने कहा कि मरीज को मत बताना कि उन्हें कैंसर है। इस पर उन्हें हंसी आ गई और कहा कि वह खुद ही मरीज हैं और बिना किसी सहायक के आए हैं।
जब उन्होंने डॉक्टर से खुलकर सारी बात पूछी तो कहा कि सही तरीके से दवा लेने पर चार से पांच महीने तक जीवित रह सकते हो, लेकिन सुभाष उसी दिन डॉक्टर को बोल आए कि वह आसानी से हार नहीं मानेंगे। पहले साइकिल से सिर्फ ड्यूटी पर जाते थे या बाजार के काम करते थे। उसके बाद लंबी दूरी की यात्रा भी साइकिल पर करने लगे। सुभाष बताते हैं 2017 में आरक्षण आंदोलन में उनकी ड्यूटी नरवाना व दनौदा में लगी। तब एक महीने तक साइकिल से दनौदा तक आने-जाने का 150 किलोमीटर का सफर साइकिल से करते थे।