पंकज रोहिल्ला
बहादुरगढ़। शहर में अब न केवल युवा बल्कि किशोर भी नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। नशा भी न केवल एल्कोलिक बल्कि इंजेक्शन और स्मैक का। शहर मेें कई तरह के नशे हैं जो आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं, इसलिए नई पीढ़ी इनकी आदी हो रही है।
शहर के सेक्टर-9 में स्थित एडिक्शन ट्रीटमेंट फेसिलिटी (एटीएफ) सेंटर में 294 लोग नशे की लत के पहुंचे। इनमें एक दंपती भी है। चिकित्सकों के अनुसार, यह लोग लगातार नशा छोड़ने की दिशा में चल रहे हैं। यह सेंटर फरवरी 2024 में शुरू हुआ है। एटीएफ सेंटर में इलाज के लिए पहुंचे नशे के आदी लोगों में 12 वर्ष से 35 वर्ष तक की आयु के युवाओं की संख्या ज्यादा है। जो कभी यारी दोस्ती या कभी स्टेटस सिंबल के कारण नशे की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं।
एटीएफ सेंटर के अधिकारियों के अनुसार, युवाओं में इंजेक्शन और स्मैक से नशा करने वालों की संख्या ज्यादा है। इसके अलावा गांजा, टैबलेट व कफ सिरप, अफीम के जरिए नशा की आदत भी युवाओं में बढ़ी है। इंजेक्शन के नशे के आदी व्यक्ति की पहचान आसानी से नहीं हो पाती है। इसके साथ ही इंजेक्शन के नशे की कीमत कम होने के साथ ही आसानी से मेडिकल स्टोर्स पर मिल जाते हैं, इसलिए युवाओं में इस नशे की आदत बढ़ी है।
हर महीने आते हैं नए मरीज
बहादुरगढ़ के एटीएफ सेंटर में फरवरी 2024 से अब तक 294 लोगों का पंजीयन हुआ है। इसमें अधिकतर इंजेक्शन और स्मैक का नशा करने की लत के हैं। हैरानी की बात ये है कि इनमें एक महिला भी है, जो दर्द निवारक इंजेक्शन लेने के कारण नशे की आदी हो गई। इस केस से एक बात तो साफ हो गई कि दर्द की दवाएं ज्यादा लेने से भी नशे की लत लग जाती है। बिना दर्द निवारक दवा लिए मरीज बेचैन रहता है।
इन दवाओं का हो रहा नशे में इस्तेमाल
एटीएफ सेंटर के इंचार्ज डॉ. मधुप ने बताया कि नशा करने वाले युवा धनाड्य, मध्यम वर्गीय और गरीब सभी तरह के परिवारों से हैं। ये युवा तनाव या फिर जीवन में आनंद उठाने के लिए नशे का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए एडोनेक, बुपे्रनॉर्फीन के इंजेक्शन, नींद की दवाइयां जैसे नाइटरसिट, एलेप्रेस्कस, काम्पोज, वेलियम प्राक्सम, विभिन्न सीरप में खांसी की दवाइयां बेनाड्रिल, कोरेक्स व एलोपैथिक दवाएं जिन्हें असंतुलित मात्रा में ग्रहण कर मस्त हो जाते हैं, जिससे इनका तनाव कम होता है और चिंता से मुक्ति मिल जाती है। इस तरह के नशे को करने वाले की पहचान आसानी से नहीं हो पाती है, जिस तरह से शराब पीने वालों की पहचान हो जाती है, इसलिए नशा करने वाले युवा मेडिकेटेड नशे की ओर खिंच रहा है। नशे की ये दवाइयां आसानी से मिलने की वजह से ही इनका इस्तेमाल बढ़ा है। डॉक्टर की पर्ची के बिना न दी जाने वाली ये दवाएं मेडिकल स्टोर्स पर बिना डॉक्टर के पर्चे के मिल जाती हैं।
झिझकें नहीं, इलाज कराएं
किसी भी कारण से यदि किसी को नशे की लत लग गई है तो इलाज कराने आने में झिझकें नहीं। एटीएफ सेंटर पर मरीज का नाम गोपनीय रखकर उनका इलाज किया जाता है। नशे के आदी युवाओं को तिरस्कार नहीं सहयोग देकर नशे की गिरफ्त से बाहर लाया जा सकता है।
-डॉ. सुशील कुमार, नोडल ऑफिसर, एटीएफ सेंटर, बहादुरगढ़
नशा आसानी से छोड़ा जा सकता है। केवल इसके लिए मानसिकता बदलनी होती है। किसी मरीज को इलाज के साथ सही माहौल मिलता है तो उसमें सुधार संभव है। कई मरीज ठीक होकर यहां से गए हैं। अधिकांश मरीज नशा छोड़ने के बाद अपना काम भी कर रहे हैं।
-डॉ. राजन, मनोचिकित्सक, एटीएफ सेंटर, बहादुरगढ़
10 महीनों में यह पहुंचे एटीएफ सेंटर
फरवरी 11
मार्च 13
अपै्रल 14
मई 19
जून 25
जुलाई 23
अगस्त 26
सितंबर 47
अक्तूबर 56
नवंबर 50
-फोटो 58 : सेक्टर-9 के पॉली क्लीनिक में संचालित एटीएफ सेंटर। संवाद
-फोटो 59 : डॉ. मधुप सेठी, इंचार्ज
-फोटो 60 : डॉ. सुशील कुमार, नोडल आफिसर
-फोटो 61 : डॉ. राजन, मनोचिकित्सक
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