बहादुरगढ़। दिव्यांगता सफलता की मोहताज नहीं होती है। इस बात को गांव मांडोठी निवासी नरेश दलाल ने साबित कर दिया है। उन्होंने अपने जज्बे के बल पर दिव्यांगता को गुलाम बना लिया। जन्म से 85 फीसदी दिव्यांग होने के बावजूद कड़ी मेहनत करके वह राजकीय महाविद्यालय बहादुरगढ़ में वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष बने। इसके साथ ही वह जिला पुस्तकालय गुरुग्राम के नोडल अधिकारी की जिम्मादारी भी संभाल रहे हैं। उन्होंने अपनी सफलता में दिव्यांगता को कभी आड़े नहीं आने दिया।
नरेश दलाल का जन्म गांव मांडोठी में हुआ था। उनके पिता किसान हैं। चार भाइयों में वह सबसे बड़े हैं। जन्म से ही उनके दोनों पैरों में दिक्कत होने के कारण उनके माता-पिता व परिजनों को उनके भविष्य की चिंता सताती रही थी। नरेश दलाल ने स्कूली शिक्षा गांव के ही स्कूल से पूरी की और उसके बाद स्नातक की पढ़ाई करने के बाद पुस्तकालय विभाग से स्नातक व स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। इसके बाद सरकारी सेवा राजकीय उपमंडल पुस्तकालय बहादुरगढ़ से शुरू हुई। अब वह यहां वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष व जिला पुस्तकालय गुरुग्राम के नोडल अधिकारी भी है।
हर रोज गोद में लेकर स्कूल पहुंचाते थे पिता
नरेश दलाल ने बताया कि उनके माता-पिता ने उनकी परवरिश के अलावा शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया। पिता हर रोज गोद में लेकर स्कूल में कक्षा में बैठाकर आना और फिर छुट्टी होने पर घर तक लाते थे। परिवार का पूर्ण सहयोग मिलने पर उन्होंने हौसलों को उड़ान दी। कठिन परिश्रम के साथ कॅरिअर को भी नई ऊंचाई देने का कार्य किया। दिव्यांगता को मात देकर उन्होंने सफलता हासिल की। आज वे अपने पैरों पर खड़े हैं।
‘दिव्यांग व्यक्ति अपने हौसलों को मजबूत कर सपनों को दें उड़ान’
नरेश ने कहा कि दिव्यांग व्यक्ति को अपने हौसलों मजबूत करना चाहिए। उन्हें किसी भी कीमत पर हार नहीं माननी चाहिए। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम के साथ उन्हें अपने सपनों को उड़ान देना चाहिए। उन्हें अपने अंदर कुछ कर देने का जज्बा पैदा करना चाहिए।