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शिक्षा और साहित्य में विकास और तरक्की के रास्ते ढूंढते आंदोनकारी

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आंदोलकारियों की कला प्रदर्शनी में ड्राइंग करते आसपास से आए श्रमिकों के बच्चे। संवाद - फोटो : Bahadurgarh
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कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसान आंदोलन में किताबें और कूचियां भी सहायता कर रहीं हैं। किसानों के मुताबिक उनके हक के जंग में लड़ने की जज्बा उन्हें किताबों से मिल रहा है। वहीं स्थानीय मजदूरों के बच्चे चित्रकारी सीख रहे हैं।
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केंद्र सरकार से तीन कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी के स्थायी प्रावधान की मांग कर रहे आंदोलनकारी किसानों के टीकरी बार्डर पड़ाव में मेट्रो डिपो के सामने बाईपास के सर्विस लेन के साथ पंडाल चल रहा है। बेहद साफ सुथरे और सुव्यवस्थित इस पंडाल को बठिंडा जिले की तहसील तलवंडी साहब के गांव तगराली के युवा रेशम सिंह गोदारा चला रहे हैं। बठिंडा क्षेत्र के कुछ और युवा किसान भी हर रोज कुछ घंटे का समय देकर पंडाल को चलाने में उनकी मदद करते हैं। इसमें शाम 5:30 तक पुस्तकालय, वाचनालय व कला प्रदर्शनी चलती है। शाम को 6 से 8 बजे तक विचार गोष्ठी होती है। इस गोष्ठी में किसान आंदोलन और कई दूसरे समसामयिक विषयों पर चर्चा की जाती है। रात को यहां आंदोलनकारियों के ठहरने के लिए 40 बिस्तरों की व्यवस्था रहती है।
पंडाल की कला प्रदर्शनी बड़ों को तो अपनी ओर आकर्षित करती ही है। आसपास की फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों और आंदोलन में आने वाले सैकड़ों बच्चों के लिए यह प्रदर्शनी बहुत उपयोगी साबित हो रही है। विदेशी आक्रांताओं से लड़ते साहिबजादा अजित सिंह, तृतीय विश्व युद्ध और काम की इंतजार में भीड़ वाले लेबर चौक का यहां लगी पेंटिंग्स में जीवंत चित्रण है। यहां बच्चों के लिए बेस्ट ऑफ विक्रम बेताल जैसी किताबें भी हैं। बच्चों को निशुल्क कलर और ड्राइंग बुक उपलब्ध कराई जा रही है। रेशम सिंह ने बताया कि हर रोज 50 से अधिक बच्चों को कुछ सीखने का मौका मिल रहा है। ड्राइंग बुक में रंग भर रहे करीब 8 साल के बच्चे जगन ने कहा कि पापा कलर नहीं लाते, यहां रोज मिलते हैं। मैंने यहां तिरंगा बनाया।
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हर रोज 400 से अधिक लोग उठाते हैं लाभ
प्रत्येक दिन 400 से अधिक लोग पुस्तकें, पत्रिकाएं और समाचार-पत्र पढ़ने का लाभ उठाते हैं। पुस्तकालय में जिन पुस्तकों व पत्रिकाओं की एक से अधिक प्रतियां उपलब्ध हैं उनकी एक छोड़कर बाकी प्रतियां पाठकों को इश्यू कर दी जाती हैं। बाकी पुस्तकें यहीं बैठकर पढ़नी होती हैं। पुस्तकालय के रजिस्टर के मुताबिक बुधवार तक 352 पाठक पुस्तकें व पत्रिकाएं इश्यू करवाकर ले गए। रेशम सिंह ने बताया कि आंदोलनकारी किताबों को पढ़कर खुद ही लौटा जाते हैं। आंदोलनकारी कार्ल मार्क्स, तस्लीमा नसरीन, लेनिन, मुंशी प्रेमचंद और खुशवंत सिंह को भी पढ़ना पसंद करते हैं। पुस्तकालय में आए मोगा के युवा सतवंत सिंह ने बताया कि वह पाश को ढूंढ रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला इश्यू करवाकर ले गए हैं। बठिंडा से आए अनिल कुमार ने बताया कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में बड़े सहज तरीके से ग्रामीण क्षेत्र की हकीकत से रूबरू करवाया है। बुढ़लाडा से आए अध्यापक परमानंद ने पुस्तकालय में बैठकर हिंदी में फेल न करने की नीति : एक बहस का अध्ययन किया, तो यायावर की तरह रहने वाले लुधियाना से आए अरविंद कुमार मशहूर यात्रा वृत्तांत लेखक बृजमोहन गुप्त द्वारा अनूदित कर्नल टीपीएस चौधरी की सागर यात्रा को पढ़ते नजर आए।
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