हादसे की सूचना मिलने पर परिजन मौके पर पहुंचे। कभी अस्पताल तो कभी फैक्टरी के आसपास, कई जगह मोनू को तलाशा गया लेकिन नहीं मिला। देर रात को एक शव नागरिक अस्पताल में पहुंचा था। इसी सूचना पर वे शनिवार की सुबह फिर से अस्पताल में गए। शव का काफी हिस्सा झुलसा हुआ था। जो हिस्सा मलबे तले दबा वो जलने से बच गया।
चेहरे की बनावट व जूतों से शव की शनाख्त हो सकी। मोनू की मौत पर बड़े भाई का रो-रोकर बुरा हाल था। वहीं पिता मंगल भी अपने आंसू नहीं रोक पाया। दोपहर बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम करा शव परिजनों को सौंप दिया। बहादुरगढ़ के श्मशान घाट में शव का दाह संस्कार किया गया।
बेहद हंसमुख था मोनू
परिजनों के मुताबिक, मोनू बेहद हंसमुख स्वभाव का था। उसके एक हाथ में थोड़ी दिक्कत थी। डॉक्टरों ने कहा था कि जब काम करेगा तो धीरे धीरे हाथ ठीक हो जाएगा। इसीलिए उसने नौकरी शुरू की थी। अपनी ड्यूटी के प्रति निष्ठावान था। हमेशा समय पर फैक्टरी जाता था। यार-दोस्तों के साथ घूमने का शोक था और अकसर कांवड़ भी लाता था।
सालभर बाद करनी थी शादी
दरअसल, मृतक मोनू के पिता मंगल सिंह करीब 20 साल पहले रोजगार के सिलसिले में बहादुरगढ़ आए थे। कुछ समय तक जटवाड़े में रहे फिर एमआईई स्थित एक फैक्टरी में रहने लगे। अभी कुछ वर्षों पहले ही छोटूराम नगर में खुद का मकान लिया था। सोनू के मुताबिक, मोनू अब काम करने लगा था। इसलिए उसकी शादी के लिए रिश्ता देखना शुरू कर दिया था। सालभर में विवाह करने की योजना थी।