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कोरोना ने लौटाया प्रकृति का सुंदर स्वरूप : डॉ ओझा

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झज्जर। सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, लेकिन यह सही है कि पिछले कई दशकों के बाद सिर्फ कोरोना काल में ही पृथ्वी का सुंदर स्वरूप देख पाए थे। कोरोना संक्रमण के कारण जब पूरी दुनिया लॉकडाउन में थी। तब जानवर बाहर आ गए थे। जिन्हें कभी हमने अपने बचपन में देखा था वे चिड़ियां दिखने लग गई थीं। हमारे आसपास एक अलग प्रकार का नजारा था क्योंकि प्रदूषण का स्तर कम था। यह बाते पृथ्वी दिवस पर एसआईएएसटीई सहायक प्राध्यापक रसायन डॉ लोकेंद्र कुमार ओझा ने कही।
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उन्होंने कहा कि मानों पृथ्वी ने अपना जिम्मा खुद अपने हाथों में ले लिया हो। कोरोना के दौरान हमारी प्रकृति का सुंदर स्वरूप लौट आया था। लॉकडाउन के दौरान जब हम अपने घरों में कैद थे तब नदी नालों से लेकर हवाएं तक स्वच्छ हो गई थीं। घर आंगन में पक्षियों की चहचहाहट गूंजने लगी। डॉ. ओझा ने कहा कि अमेरिका में हो रहे औद्योगिक विकास से होने वाले नुकसान की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करने के लिए आज ही के दिन पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। महात्मा गांधी ने कहा था कि प्रकृति में इतनी ताकत होती है कि वह मनुष्य की हर जरूरत पूरा कर सकती है, लेकिन लालच नहीं। यही कारण है कि पृथ्वी के संरक्षण को लेकर 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। पृथ्वी पर रहने वाले तमाम जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को बचाने व दुनिया भर में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लक्ष्य के साथ इस दिवस को संपूर्ण विश्व में मनाया जाने लगा है।
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