उन्होंने बताया कि जब कभी वहां पर मौजूद लोगों को बाल विवाह न करने के बारे में नसीहत देती तो पुरुष बुरा मानते। कई बार मेरे साथ मारपीट की गई, मुझे कमरे में भी बंद रखा गया। एक बार तो मेरी कनपटी पर पिस्तौल तान दी थी लेकिन मैं घबराई नहीं। अपने क्षेत्र में आगे बढ़ती गई। अपना ऐसा दबदबा कायम किया कि लोग अपने बच्चों की शादी से पहले मुझे जन्म प्रमाण-पत्र दिखाने के बाद शादी करने लगे। उन्होंने बताया कि शायद ही मैंने कभी अपने बच्चों की पीटीएम या अन्य कोई कार्यक्रम हिस्सा लिया हो। उनका कहना है कि बेटा और बेटी में भेदभाव खत्म करें और अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं।
नागरिक अस्पताल की पीएमओ डॉ. रत्ना भारती ने अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा कि बचपन से डॉक्टर बनने का सपना था। परिवार और शिक्षकों ने साथ दिया और आज मैं इस मुकाम पर पहुंच चुकी हूं। जब 11वीं कक्षा में थी, तब पिता का साया उठ गया था। उस समय लगा कि अब आगे नहीं पढ़ पाऊंगी, लेकिन शिक्षक और मेरे दोस्त घर आए उन्होंने समझाया। अपनी जिंदगी में शिक्षकों के योगदान को मैं कभी नहीं भूला सकती।
डॉक्टर बनने के बाद पहली पोस्टिंग 1985 में कालांवाली में हुई। इसके बाद 2001 में कैमरी आई। जब उनसे पूछा कि पूरे जिले की जिम्मेदारी कैसे संभालते हो तब उन्होंने बताया आप कोई काम करते हैं तो उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। हमें चुनौतियों का सामना करना चाहिए न कि उससे दूर भागना चाहिए। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि वह एक लक्ष्य लेकर चलें और जो रुकावटें उनके लक्ष्य के दौरान आती हैं उनसे दूर न भागे बल्कि उनका सामना करें।