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ये देश हमारा है, इसे जलने न देंगे, दुश्मनों को कभी पलने न देंगे...

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अमर उजाला ऑफिस में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में काव्य गोष्ठी में कविता पाठ करते कवि-कवयित्री। सं? - फोटो : Hisar
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हिसार। ये देश हमारा है, इसे जलने न देंगे, देश के दुश्मनों को कभी पलने नहीं देंगे। फिरका परस्ती को मिटाएंगे जहान से, सपनों का भारत हम लाएंगे युवान से, मिले अवसरों को हम कभी टलने न देंगे। देश के लिए यह जज्बात काव्य गोष्ठी में कवयित्री पूनम मनचंदा ने कहे। वह अमर उजाला कार्यालय में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित काव्य गोष्ठी में अपने विचार रख रही थी।
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करीब एक घंटे चली इस गोष्ठी में कवियों ने देशभक्ति, गणतंत्र दिवस, बेटों की संवदेनशीलता, राष्ट्रीय एकता, दिव्यांगों के जीवन पर आधारित मार्मिक कविता प्रस्तुत की। काव्य गोष्ठी का संचालन जीजेयू की कर्मचारी रश्मि ने किया, जबकि अध्यक्षता हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष कमलेश भारतीय ने की। काव्य गोष्ठी में प्रोफेसर मिहिर रंजन पात्र, कार्टूनिस्ट एवं साहित्यकार डॉ. मनोज छाबड़ा, कवयित्री सविता रतिवाल, पूनम मनचंदा, अर्चना ठकराल, डॉ. रवीश गर्ग ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।
कमलेश भारतीय, साहित्यकार
लाल किले की प्राचीर से कविता पढ़ने की इच्छा बहुत रही, लाल किले से प्रधानमंत्री भी संबोधित करते हैं, वे भी जनता की समस्याओं के बारे में कहते हैं, मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं। कवि भी कविता पढ़ते हैं, लाल किले पर वे भी जनता के सवालों से बचते हैं, कश्मीर पर देशभक्ति और पड़ोसी देशों को कोस कर अपनी इतिश्री कर लेते हैं।।
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अर्चना ठकराल, कवयित्री
यदि लड़की घर को रोशन करती हैं,
तो लड़के भी घर की धड़कने होते हैं,
लड़कियों के घर छोड़कर जाने का भय होता है,
तो उनका एक घर छोड़ कर जाने के बाद दूसरा घर होता है,
अपनों के सपनों के लिए ये भी मजबूर होते हैं,
हां जी लड़के भी रोते हैं जब वो घर से दूर होते हैं॥
डॉ. रवीश गर्ग, साहित्यकार
मैं शिक्षक हूं धृतराष्ट कैसे बनूं,
बाह्य आंखें तो बंद कर लूंगा,
अंदरूनी आंखें कैसे बंद करूं,
रूह सब देख रही है...
अंतर चेतना का निर्वाण करूं
अलख जलाना मेरा अभिलक्षण
अभिलक्षण कैसे परित्याग करूं
मृत्यु पर्यंत भी आंखें विरासत,
मैं आंखें कैसे बंद करूं, मैं शिक्षक हूं, धृतराष्ट कैसे बनूं॥
सविता रतिवाल, कवयित्री
संप्रभुता सत्ता सपन्न है संविधान हमारा है,
जन-जन फले फूले यही गणतंत्र का नारा है,
आजकल गणतंत्र कहते ही मेरी जुबान फिसल जाती है
गण अलग हो जाता है तंत्र अलग हो जाता है,
बहू-बेटी की लुटी इज्जत पर, भाग्य विधाता की खामोश
चादर ओढ़ पुलों के नीचे ठिठुरन भरी रातों में
पैरों को पेट के बीच चिपकाए
वोट देकर चुनता है जिसे
उसी दर पर ठोकर खाए॥
डॉ. मनोज छाबड़ा, कार्टूनिस्ट एवं साहित्यकार
गुमटी पर मेरे पास लकड़ी के फट्टे पर बैठा
चाय पी रहा था वह और अचानक उठकर
अपनी मुहल्लाई आदतों और बनावट सहित
सिनेमा के पर्दे पर जा बैठा था
कुकीज के पैकेट की बगल में
वह ताजा पके हुए बिस्कुट का भरा हुआ लिफाफा था
वह यह भी जानता था, उसका पर्दे पर होना
रिक्शावाला की थकी आत्मा पर
नरम आश्वासन है॥
रश्मि, कवयित्री
बचपन का दोस्त मिक्का
बहुत याद आ रहा है, पोलियो के कारण उसके पांव बचपन से ही काम नहीं करते थे
पांव का काम वह अपने हाथ से ही लेता था, मैं पतंगबाजी में बहुत मजा लेता
वह कड़ी धूप में पीछे बैठका चरखड़ी संभालता था॥
पूनम मनचंदा, कवयित्री
शान व मान से मेरा तिरंगा फर फर फर फहराए।
ऐसी कीर्ति फैले जग में हर कोई स्तब्ध रह जाए।
समस्त विश्व में भारतवर्ष का परचम ये लहराए
तिरंगा हमारा विश्व पताका बन कर के फहराए।।
डॉ. मिहिर रंजन पात्र
जिंदगी हिसाब मांगती है और मैं हिसाब नहीं रखता
मैं हिसाब नहीं रखता और बेहिसाब लिखता हूं,
ममता लड़ रही मनजाते से
मनजोत लड़ रही मलाला से
मलाला लड़ रही मरियम से
करीबा आजादी के नारे लगा रहा॥
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