बास। फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर पूर्ण अंकुश लगाने के लिए कृषि विभाग और प्रशासन इस बार निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करेंगे। पराली जलाने की घटनाओं पर उपग्रह के साथ ड्रोन के माध्यम से भी 24 घंटे नजर रखी जाएगी। गांव बास में निगरानी के लिए विशेष यंत्र स्थापित किया जाएगा, जिसकी प्रतिदिन रिपोर्टिंग होगी।
गांव बास बादशाहपुर में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की ओर से बुधवार को फसल अवशेष प्रबंधन जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। इसमें करीब 200 किसानों ने भाग लिया। उपमंडल कृषि अधिकारी रवींद्र कुमार ने कहा कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ भूमि की उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
किसानों को आग लगाने के बजाय आधुनिक तकनीकों से फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करना चाहिए। पराली को खेत में ही प्रबंधित करने के अलावा खेत से बाहर निकालकर या पशु चारे के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है।
सहायक कृषि अभियंता गोपीराम सांगवान ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन में उपयोग होने वाली आधुनिक कृषि मशीनों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सुपर सीडर से अवशेषों का खेत में ही प्रबंधन किया जा सकता है जबकि बेलर मशीन से पराली की गांठें बनाकर उन्हें खेत से बाहर निकालकर उपयोग में लाया जा सकता है।
पराली जलाने से मिट्टी के जैविक तत्वों को होता है नुकसान :
ब्लॉक कृषि अधिकारी पवन भारद्वाज ने कहा कि फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन किसान, कृषि भूमि और पर्यावरण तीनों के लिए लाभकारी है। पराली जलाने से मिट्टी के जैविक तत्वों को नुकसान पहुंचता है जबकि अवशेषों को खेत में मिलाने से जैविक पदार्थों की मात्रा बनाए रखने और भूमि की सेहत सुधारने में मदद मिलती है। शिविर में अधिकारियों ने किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने किसानों से पराली नहीं जलाने और अन्य किसानों को भी जागरूक करने का आह्वान किया।