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मीठा पानी निकलने के कारण पड़ा नाम मिठड़ी

Fri, 14 Oct 2016 12:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/सिरसा
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Mithdi Village - फोटो : Bureau
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गांव गाथा अभियान के तहत अमर उजाला ओढां खंड के गांव मिठड़ी के इतिहास से रूबरू हुआ। राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर नौ के छोर पर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर और तहसील मुख्यालय डबवाली से 19 किलोमीटर दूर उत्तर दक्षिण में बसा गांव मिठड़ी अपने आप में 183 वर्ष का इतिहास समेटे हुए है। करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव का रकबा 3800 एकड़ है। डबवाली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस गांव में करीब 1730 मतदाता हैं। गांव में लिगांनुपात की बात करें तो वहां पर एक हजार लड़कों के पीछे 714 लड़कियां हैं।
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गांव के इतिहास बारे में जब बात की गई तो गांव की चौपाल में बैठे बुजुर्ग हाकम सिंह, मुखत्यार सिंह, नत्था सिंह, मोहन सिंह, गुरबचन सिंह, सरदूल सिंह, अमरजीत सिंह आदि ने अतीत में झांकते हुए बताया कि जब ये गांव उत्पत्ति में नहीं आया था उस वक्त वर्ष करीब 1833 में सूचांवाली पंजाब से गुलाब सिंह सूच नामक व्यक्ति यहां आया था। जिसके साथ मिठी फूलो पंजाब से हीरा सिंह व वजीरा सिंह अपने तीन भाइयों के साथ आया। जिसके बाद गांव में पंडित, सुथार, हरिजन व रामदासिया सहित अन्य कई बिरादिरयों के लोग यहां आए और इस प्रकार ये गांव अस्तित्व में आया। गांव में दो पत्तियों का गठन किया गया जिसे सूच व मलकाना पत्ती नाम दिया गया। बुजुर्गों के अनुसार उस समय गांव में पानी की बड़ी किल्लत थी जिसके चलते लोग दूर दराज क्षेत्रों से ऊंटों पर पानी लाते थे। बाद में गांव में कुंए खुदवाए गए जो  पूरे गांव कि प्यास बुझाते थे। बुजुर्गों के अनुसार गांव में धरती के निचले हिस्से का पानी खारा था, बाद में एक जगह पानी मीठा निकला जिसके बाद इस गांव का नाम मिठड़ी पड़ा। इस गांव को पूर्व में सूचांवाली व कर्म सिंह वाली मिठड़ी भी पुकारा जाता था, लेकिन बाद में धीरे धीरे ये गांव मिठड़ी के नाम से प्रचलित हो गया जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है।  

चनण सिंह बने पहले सरपंच
1953 में चनण सिंह सूच को गांव का सरपंच व महासिंह को नंबरदार चुना गया। जिसके बाद लाल सिंह सिधु को सरपंच चुना गया। इसके बाद जग्गर सिंह ने करीब नौ वर्ष तक गांव की सरपंची संभालते हुए शिक्षा क्षेत्र में कदम बढ़ाकर गांव में प्राथमिक स्कूल की स्थापना करवाई लेकिन स्कूल के लिए कोई जगह न मिलने के चलते गांव में स्थित एक धर्मशाला में शिक्षा आरंभ की गई जो इस समय भी गांव के मुख्य चौक में स्थित है जिसके बाद करीब 1959 में सरपंच लाल सिंह ने छह बीघा पंचायती जमीन का प्रस्ताव पारित कर शिक्षा का दीप प्रजवलित करने में भरपूर सहयोग दिया। वर्ष 1980 में स्कूल को दसवीं का दर्जा मिला तो वहीं वर्ष 2012 में इसे वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का दर्जा मिला। इस बार गांव के लोगों ने गुरपाल सिंह को गांव का सरपंच चुना है।
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देश के लिए धड़कता है दिल
शिक्षा क्षेत्र की बात करें तो इस गांव में करीब 40 लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं, काफी लोग अधिवक्ता हैं। जिसके चलते इस गांव को वकीलों वाली मिठड़ी भी कहा जाता है। इस गांव से सरदार मग्घर सिंह व भगवान सिंह आजाद हिंद फौज के सिपाही रहे हैं। मौजूदा समय में गांव के करीब 12 युवा फौज में हैं। गांव के सेवानिवृत्त आईएएस  हरभजन सिंह व आर्मी से नायब सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए सुरजीत सिंह सूच का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। सुरजीत सिंह का कहना है कि हम सब एक हैं और हमारा मुल्क एक है, लोग जब जात पात की बात करते हैं तो उन्हें बड़ा दुख होता है। उनका कहना है कि युवा ज्यादा से ज्यादा फौज की नौकरी ज्वाइन करें ताकि देश की सेवा में भागीदारी निभाई जा सके।

ये है सुविधाएं :
राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने के कारण यहां की यातायात व्यवस्था सराहनीय है, सुबह से लेकर रात्रि तक बसों का आवागमन रहता है। गांव में उप स्वास्थ्य केंद्र, पशु अस्पताल, सहकारी समिति, सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जलघर, धर्मशालाएं व बस स्टैंड सहित अनेक सुविधाएं हैं।

ये है समस्याएं
गांव में आज भी अधिकांश गलियां कच्ची हैं जिनमें कुछ अधर में लटकी हुई है। इसके अलावा गांव में कोई बैंक सुविधा नहीं है तथा बेसहारा घूम रहे पशुओं की तादाद काफी है जो हाईवे के इर्द गिर्द रहते हैं जो हादसे का सबब बनते हैं। इसके अलावा गांव में स्थित वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में स्टाफ का भी टोटा है जिससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है।

धार्मिक आस्था
गांव में मंदिर, गुरुद्वारा और अन्य धार्मिक स्थल हैं जिनमें हाईवे के  किनारे बना श्रीचंद उदासीन आश्रम डेरा साहिब बड़ा अखाड़ा काफी प्राचीनतम और लोगों की धार्मिक आस्था का केन्द्र है। इसे 1964 में बाबा वकील दास ने बनवाया था। हर वर्ष की 15 अगस्त को वहां पर भव्य धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिसमें दूर दराज से काफी संख्या में साधू महात्मा यहां शिरकत करते हैं। यहां के लोग बिना किसी भेदभाव के मंदिर, डेरा व गुरुद्वारा में आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत कर एक दूसरे की धार्मिक आस्था को कायम रखते हैं।
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