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अब बचे बर्बादी के निशां... और आंखों में आंसू

Thu, 25 Feb 2016 12:20 AM IST
अमर उजाला हिसार/ब्यूरो
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जातीय हिंसा में बदला जाट आरक्षण आंदोलन अपने पीछे कभी न भुलाने वाला दर्द छोड़ गया है। ढाणी पाल में मंजर इतना भयावह था कि उसकी छाप सालों तक पीड़ितों के जहन में बसी रहेगी।
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छोटे से गांव के खेतों में बसे 27 लोगों का परिवार इस आंदोलन से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इनमें कई सैनिकों के भी मकान हैं, जो सीमा पर देश को दुश्मनों से बचाने के लिए जान की बाजी लगाते हैं।

हालात यह है कि इन घरों में पानी पीने के लिए गिलास तक नहीं बचे हैं। रोटी बनाने के लिए चूल्हा नहीं है तो पहनने के लिए कपड़े भी नहीं है।

सोने की लिए चारपाई तो दूर बिछाने के लिए चादर भी नहीं बची है। इतना ही नहीं बच्चों की किताबें जल चुकी हैं। बचे हैं तो सिर्फ आधे जले हुए बैग। अधिकांश पशु भी गायब हैं।
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खौफजदा हर कोई
जिदंगी भर की कमाई पल भर में खाक हो गई। अमर उजाला ने जब इस गांव की बर्बादी का जायजा लिया तो पाया कि बच्चों के दिमाग से खौफ जाने का नाम नहीं ले रहा है।

कई बच्चे रात को ठीक से सो नहीं पा रहे हैं। रात को जागते हैं तो उनके मुंह से एक ही बात निकलती है कि कहीं वे (उपद्रवी) फिर तो नहीं आ रहे।

पीड़ित परिवारों का दुख उस वक्त और भी गहरा गया, जब इतने बड़े स्तर पर हिंसा होने के बाद प्रशासन ने उनकी कोई सुध लेना भी मुनासिब नहीं समझा।

सेना को गांव की सीमा पर तैनात कर उन्हें एक तरह से खेतों में ही सील कर दिया गया है। किसी को मिलने भी नहीं दिया जा रहा है, ताकि अंदर की बात बाहर न आ जाए।

प्रशासन ने की छुपाने की भरसक कोशिश
गांव में मची तबाही को प्रशासन ने छुपाने की भरसक कोशिश की। प्रशासन को इस बात का पूरा पता था कि गांव में जमकर आगजनी और लूटपाट हुई।

इसके बाद भी प्रशासन ने कोशिश की मीडिया तक ये बातें नहीं पहुंच पाए। प्रशासन शायद यह भूल गया कि सच्चाई को ज्यादा दिन तक छुपाया नहीं जा सकता है। बुधवार को आर्मी के पहरे से बचते हुए अमर उजाला टीम गांव में पहुंच गया।

अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया
अब से पहले एक डीएसपी और इंस्पेक्टर को बिगड़े हालात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, लेकिन यहां के लोग प्रशासन के एक बड़े अधिकारी पर भी संगीन आरोप लगाते हैं।

वे कहते हैं कि हम इन तमाम अधिकारियों की जातिगत राजनीति का शिकार हो गए। साधु राम गुर्जर कहते हैं कि 22 फरवरी को घर में पूरा परिवार था।

दोपहर करीब साढ़े बारह बजे उपद्रवियों ने आते ही सबसे पहले लूटपाट की। इसके बाद आग के हवाले कर दिया गया। परिवार के तमाम लोग डर के मारे भाग गए थे।

पुलिस और मिलिट्री यहां से कुछ दूरी पर सड़क पर ही खड़ी थी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। उन्हें साफ दिखाई दे रहा था कि मकान जल रहे हैं, लेकिन किसी ने आग बुझाने की जहमत नहीं उठाई।

वे कहते है कि उन्होंने चार घंटे बाद अपने घर संभाले। कपड़े सिर्फ वहीं बचे हैं जो उन्होंने पहने हुए हैं, बाकी उनके पास कुछ नहीं है। वे इस बात से चिंतित है कि जिंदगी को शुरू करने के लिए नए सिरे से जद्दोजहद करनी पड़ेगी।

अब तो आंसू बहाने के सिवाय कुछ नहीं
शारदा देवी कहती हैं कि लुटेरे सब कुछ ले गए। कुछ नहीं छोड़ा। रोते हुए दास्तां बताती हैं कि अब सिर्फ आंसू बहाने के सिवाय उनके पास कुछ नहीं बचा। समझ में नहीं आता है कि जिंदगी को दोबारा किस तरह शुरू किया जाए। जले हुए घरों को देखकर रूह कांप जाती है।

इधर, सरहद पर रक्षा कर रहा था फौजी, उधर उपद्रवी लूट रहे थे मकान
सेना में भर्ती सत्यवान यादव श्रीनगर में देश के दुश्मनों से लड़ रहा था और इधर उपद्रवी उसका मकान लूट रहे थे। सत्यवान का एक भाई सुनील यादव भी हिसार कैंट में 19 आर्म्ड में तैनात है।

सुनील यादव कहते हैं कि जब मैंने 22 फरवरी की शाम को अपनी पत्नी को फोन किया तो उसने बताया कि अपना मकान जला दिया गया है और हमने बच्चों के साथ भागकर जान बचाई है।

अपनी प्लानिंग के लिए करीब ढाई लाख रुपये जमा किए थे। उपद्रवी उसके घर से नकदी के अलावा पत्नी के लाखों के जेवरात भी लूटकर ले गए। सेना यहां लगी हुई थी।

सेना बहुत बड़ी चीज है, अगर चाहती तो तमाम लोगों के मकान बच सकते थे। बकौल, सुनील यादव यहां उनके चार भाइयों के मकान हैं।

वहीं एक अन्य मकान में लगी आग का जब मुआयना किया तो वहां रहने वाले पीके चौधरी ने बताया कि ये उनके भाई जल सेना में नायब सूबेदार राजीव चौधरी का है।

राजीव इन दिनों मुंबई में तैनात है। उपद्रवी उनके घर से नकदी और जेवर लूट ले गए और मकान को आग के हवाले कर गए।

कोई तो लें हमारी सुध
पीड़ित रघुबीर यादव कहते हैं कि सरकार की तरफ से कोई तो यहां आकर हमारी सुध लें। वे यह कहने से भी नहीं चूकते कि अगर उनकी जगह किसी दबंग के मकानों में आग लगी होती तो ये आग कभी नहीं बुझती, लेकिन उनके घरों में लगी आग में शायद वो गर्मी नहीं है, जिसकी वक्त को जरूरत है।
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