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Hisar News: पुलिस जिम्मेदार बने, नागरिक सचेत रहें तो टूटेगी नशा तस्करों की कमर, अमर उजाला कार्यालय युद्ध नशे के विरुद्ध अभियान के तहत संवाद

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हिसार। नशा युवा वर्ग को खोखला कर रहा है। इससे न केवल एक व्यक्ति और परिवार प्रभावित हो रहा है, बल्कि इसका असर पूरे समाज पर पड़ रहा है। नशे के इस जाल से बच्चों को बचाने के लिए समाज के हर वर्ग को एकजुटता से लड़ाई लड़नी पडे़गी। पुलिस ईमानदारी से कार्रवाई करे, नशे के अड्डों, तस्करों के नेटवर्क तक पहुंचे और इस धंधे में लिप्त हर व्यक्ति पर शिकंजा कसे तो निश्चित तौर पर इसके सुखद परिणाम सामने आएंगे।
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युद्ध नशे के विरुद्ध अभियान के तहत रविवार को अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में नशा मुक्ति संगठनों, एनजीओ, पुलिस की नशा मुक्ति टीम के अधिकारियों ने यह बात रखते हुए नशाखोरी से निपटने के लिए सभी से जुटने का आह्वान किया।
पुलिस की नशामुक्ति टीम से आए एसआई हवा सिंह और एएसआई लीलाधर ने बताया कि उनकी टीम हर गांव में जाती है, लेकिन अधिक प्रभावित क्षेत्रों में निरंतर निगरानी रखी जाती है। शुरुआत में आरोपियों के परिजन किसी पड़ोसी के मुखबिरी करने का शक जताते हैं। इसके बावजूद टीम 2,200 लोगों को नशे के दलदल से निकाल चुकी है। करीब 875 नशा पीड़ितों का जिला अस्पताल के नशा मुक्ति केंद्र में मुफ्त इलाज भी करवा चुके हैं। पुलिस को इस मुहिम में हर आम व्यक्ति का सहयोग चाहिए। परिवार में भी नशा करने वाला है तो उसे छिपाएं नहीं बल्कि नशा मुक्ति केंद्र तक ले जाएं।
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पुलिस की एंटी नारकोटिक्स सेल (एएनसी) के इंदर सिंह ने बताया कि नशा तस्करों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। लोग इसे केवल पुलिस की जिम्मेदारी न समझें, वे पुलिस के सहयोगी बनें। इस साल नशा तस्करी के 127 केस दर्ज कर 245 आरोपी जेल भेजे गए हैं। गांव पीरांवाली समेत शहर की आंबेडकर बस्ती, विकासनगर, मिलगेट क्षेत्र में भी कार्रवाई की है।
सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता तंवर ने बताया कि अधिकतर अभिभावक नशाखोरी के नुकसान से अनजान रहते हैं। इस कारण वे शुरुआत में अपने बच्चों को निर्दोष बताते हैं लेकिन उन्हें पता चलने तक काफी देर हो चुकी होती है। उवे कई नशा पीड़ितों को जिला नागरिक अस्पताल में उपचार के लिए ले गईं, लेकिन वहां से कोई मदद नहीं मिली। महज औपचारिकता की जा रही है। सरकारी स्तर पर और अधिक पुनर्वास केंद्र खोले जाने चाहिए।
गांव पाली से आए बाबा कृष्ण सिंह ने बच्चों के हुक्का पीने पर चिंता जताई। इसे परंपरा या शिष्टाचार का नाम देकर खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। बड़ों को देखकर बच्चे कम उम्र में ही हुक्के का सेवन करने लगे हैं। इस दौरान नशा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो चुके रवि, हरेंद्र कुमार, राहुल शर्मा और रविंद्र कुमार ने नशे से संघर्ष के अपने अनुभव साझा किए।
दवाओं से नहीं संवेदनशीलता से छूटेगा नशा : अंकुश फाउंडेशन के संचालक गंगवा निवासी विपिन शर्मा ने बताया कि वे दो दशक से नशामुक्ति मुहिम जुटे हैं। सैकड़ों युवा नशा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में आ चुके हैं। दवाओं से नशा नहीं छुड़वाया जा सकता। पुनर्वास केंद्रों और अस्पतालों में इस फील्ड से जुड़े प्रशिक्षित लोग रखने होंगे जो नशा पीड़ित की मानसिकता को समझ सकें। उनके प्रति संवेदनशीलता के साथ पारिवारिक सदस्य जैसा व्यवहार करना होगा तभी वे नशे के दलदल से बाहर आ सकेंगे। नशा छोड़ने के बाद भी कम से कम एक साल तक उस पर नजर रखें। उसका हाथ थामकर चलें।
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