राखी गढ़ी में साइट नंबर एक पर खोदाई करते छात्र। संवाद
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नारनौंद। राखीगढ़ी में साइट नंबर 3 पर पहली बार, एक नंबर साइट पर दूसरी बार और सात नंबर साइट पर इस बार तीसरी बार खोदाई हो रही है। पहली बार एएसआई के डायरेक्टर डॉ. अमरेंद्र नाथ ने 1998 से 2000 तक खोदाई की थी। दूसरी बार डेक्कन यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे ने 2011 से 2016 तक खोदाई की थी और फिलहाल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. संजय मंजूल की देखरेख में खोदाई हो रही है। उनका प्रयास है कि राखीगढ़ी को आइकॉनिक साइट के रूप में विकसित किया जाए और यहां पर आने वाले लोगों को कुछ अलग से देखने को मिले। इसलिए खोदाई की जाने वाले साइट को ओपन रखा जाएगा। पहले हुई दो बार की खोदाई में खुदाई पूरी होने के बाद साइट को मिट्टी से ढक दिया जाता था।
अभी तक की हुई खुदाई में पुरातत्वविदों द्वारा सिर्फ इतना ही पता लगा पाए थे कि हड़प्पा संस्कृति के अर्ली हड़प्पन, मैच्योर हड़प्पन व विकसित हड़प्पा काल का पता चल पाया था। अब उनके रहन-सहन घरों के तरीके को विस्तार से जानने के लिए इस बार खोदाई हो रही है। साइट नंबर 3 पर जो कच्ची और पक्की ईटों की दीवारें मिली हैं वह भी हड़प्पा कालीन सभ्यता के समय की ही हैं।
राखीगढ़ी में पुरातत्वविदों द्वारा यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि राखीगढ़ी को एक छोटे से गांव से महानगर तक बनाने में काफी सालों का समय लगा जो धीरे-धीरे एक महानगर के रूप में विकसित हुआ। इसके बाद यहां से एक बड़े औद्योगिक क्षेत्र व व्यापार के हब के रूप में विकसित हुआ।