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ढलती उम्र को पीछे छोड़ युवाओं के लिए मिसाल बने सांगवान और वामन खां

Mon, 16 May 2016 12:52 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हिसार
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ढलती उम्र को पीछे छोड़ युवाओं के लिए मिसाल बने सांगवान और वामन खां - फोटो : bureau
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मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है।
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पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।।

उक्त पंक्तियां चैंपियन आर के सांगवान और सारंगी के बादशाह मामन खां पर सटीक बैठती हैं। सांगवान अपने जीवन के 78 और मामन खां 73 बसंत देख चुके हैं। उम्र के इस पड़ाव पर जहां व्यक्ति पलंग को पकड़ कर लाठियों के सहारे चलता है। वहीं इन दोनों का जोश युवाओं को पीछे छोड़ रहा है। नियमित दिनचर्या, व्यायाम और कुछ कर गुजरने का जज्बा इन दोनों को युवा बनाये रखे है। हुनर के हीरो में आज इन दोनों शख्सियतों से आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं।

सांगवान ने जीते 35 से अधिक मेडल
हिसार। नवदीप कॉलोनी के 78 वर्षीय आरके सांगवान ने उम्र को पीछे छोड़ते हुए सिंगापुर में हुई 19 वीं एशिया मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में एक गोल्ड व तीन सिल्वर मेडल हासिल किए हैं। उन्होंने इस चैंपियनशिप में पांच किलोमीटर रेस वॉक में स्वर्ण तथा बाधा दौड़ में सिल्वर मेडल प्राप्त किया। 400 मीटर और 1600 मीटर रिले रेस में भी सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया।
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एचएयू से बतौर प्रोफेसर रिटायर हुए आर के सांगवान की बचपन से ही खेलों में रुचि रही। ग्रेजूएशन के समय उन्होंने इसमें कॅरियर बनाने की ठान ली। शुरुआत तैराकी से की, लेकिन जिस भी खेल में वे गए उसमें मेडल जीतकर ही दम लिया।

वे पहले ऐसे प्रोफेशनल तैराकी कोच हैं, जिन्होंने सबसे पहले एनआईएस का डिप्लोमा लिया था। उन्होंने 1963 में एनआईएस से डिप्लोमा हासिल कर 1964 में राजस्थान विश्वविद्यालय में ज्वाइन किया। वहां दस साल नौकरी करने के बाद 1973 में वे एचएयू में नियुक्त हुए।

यह की पढ़ाई
उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई अपने गांव में ही की। उसके बाद देश के अलग-अलग छह विश्वविद्यालयों से पढ़ाई की। उन्होंने डीएवी कॉलेज जलंधर से बीए की की। इसके बाद इसी कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान और शारीरिक शिक्षा से एमए की।

इसके बाद ग्वालियर से शारीरिक शिक्षा में डिप्लोमा तथा मास्टर डिप्लोमा किया। यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान से एलएलबी की। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। 1963 में इन्होंने तैराकी में एनआईएस से डिप्लोमा किया।

सिर्फ शाकाहारी खाना
आरके सांगवान आज भी सुबह चार बजे उठते हैं। उठकर योगा और मेडिटेशन करते हैं। इसके बाद पैदल वॉक के लिए घर से निकल जाते हैं। सांगवान बताते हैं कि वे सुबह उठकर सबसे पहले वे एलोवेरा खाते हैं। उनके अनुसार इससे उन्हें किसी तरह की बीमारी नहीं घेरती। वे शुद्ध शाकाहारी हैं। वे हर वो चीज खाते हैं जो शाकाहारी हो और जिससे एनर्जी मिलती हो।

35 में 20 गोल्ड मेडल
मूल रूप से झज्जर के सिवाना गांव के रहने वाले आरके सांगवान अब तक 35 से अधिक मेडल जीत चुके हैं। इनमें 20 के करीब गोल्ड भी शामिल है। उन्होंने 1992 में भोपाल में हुई 12 वीं नेशनल मास्टर स्वीमिंग चैंपियनशिप में अलग-अलग प्रतिस्पर्धाओं में तीन गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीता था। गोवा में हुई 36वीं नेशनल मास्टर एथलेटिक चैंपियनशिप में तथा मैसूर में 37 वीं नेशनल मास्टर एथलेटिक चैंपियनशिप में भी चार गोल्ड मेडल पर कब्जा किया था।

मामन खां ने कला के लिए ठुकरा दी थी सरकारी नौकरी
हिसार। सारंगी को दुनिया भर में पहचान देने वाले मशहूर सारंगी वादक मामन खां को आज कौन नहीं जानता। वर्तमान में हरियाणा सरकार ने मामन खान को अपने कैलेंडर में भी जगह दी है, जिससे मामन खान बेहद खुश हैं। मामन खां के पूर्वजों से लेकर पोतों तक सात पीढ़ियां सारंगी के साज को सहेजे हुए हैं।

मूलरूप से हिसार जिले के खरक पूनियां के रहने वाले मामन खान पानीपत राज घराने से संबंध रखते हैं। उनके दादा नत्थू राम तथा कूड़े खान जींद रियासत के दरबारी सारंगी वादक थे। मामन खान ने बताया कि उनके दादा ने उन्हें आठ साल की उम्र में ही छोटी सारंगी बजाना सिखाना शुरू कर दिया था। इसके बाद पिता ने सारंगी के हर साजों में निपुण बनाया। जैसे जैसे उम्र बढ़ी सारंगी से प्यार बढ़ता गया।

सांग से की थी शुरुआत
मामन खान ने बताया कि उन्होंने सारंगी बजाना तो सीख लिया था। लेकिन कॅरियर की शुरुआत सांग यानी स्वांग से की थी। रामकिशन व्यास के साथ लगभग छह वर्षों तक सांग के लिए काम किया। इसके बाद चंद्रबांदी के साथ अभिनय किया। धनपत के साथ भी लंबे समय तक सांग में काम किया।

कई देशों में मनवाया हुनर का लोहा
मामन खान को वास्तविक पहचान तब मिलनी शुरू हुई जब उन्हें एक बार चंडीगढ़ में पब्लिक रिलेशन विभाग में बुलाया गया। उन्हें 1978 में सरकारी नौकरी की पेशकश भी हुई लेकिन उन्होंने सांग में ही अधिक रुचि होने के कारण नौकरी को ठुकरा दिया।
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धीरे-धीरे जब सांग बंद हो गए तो उन्होंने पब्लिक रिलेशन विभाग में 1986 में ज्वाइन कर लिया। इसके बाद सरकार ने उन्हें बार-बार विदेशों में सारंगी वादन के लिए भेजा। उन्होंने लीबिया, घाना, कुवैत, सीरिया, मोरक्को, मिस्र, ट्यूनीशिया, बुर्किनाफासों आदि देशों में अपने हुनर का लोहा मनवाया है।

राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
मामन खां को सन 2000 में भारत के राष्ट्रपति ने ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया। इसके बाद 2003 मेें हरियाणा कला रत्न अवॉर्ड द्वारा सम्मानित हुए।
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