फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खेतों में चौकीदार की तरह सर्द रातें बिता रहा अन्नदाता

Tue, 22 Dec 2015 11:56 PM IST
अमर उजाला हिसार/ब्यूरो
विज्ञापन
विज्ञापन
इस कड़कड़ाती ठंड में जहां लोग घरों में दुबक जाते है, वहीं किसानों की रातें खेतों में गुजर रही हैं। किसानों के नसीब में ना दिन में चैन है और ना ही रातों को नींद।
विज्ञापन


खेतों में बोई फसलों को लावारिस पशुओं से बचाने के लिए किसानों को रात-रात भर चौकीदारों की तरह रखवाली करनी पड़ रही है। रात के समय शहरों से खेतों की ओर जाने वाले पशुओं के झुंड फसलों को बर्बाद कर रहे हैं।

किसानों की इस समस्या के समाधान के लिए ना प्रशासन की ओर से कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और ना ही सरकार की ओर से कोई योजना बनाई गई है।

गौशालाओं में भी पहले से ही भारी संख्या में पशुओं की तादाद होने से वो भी नए पशु रखने में असमर्थता जता रहे हैं।

कई किसानों ने एक-दूसरे के खेत में फसल की रखवाली के लिए बारी-बारी से समय निश्चित किया हुआ है, तो कई ने रखवाली के लिए समूह बनाए हुए हैं, ताकि दिन-रात फसल की रखवाली हो सके।
विज्ञापन


दो साल से गौशालाओं को नहीं मिला अनुदान
लावारिस पशुओं के समाधान के लिए सबसे पहला नाम गौशालाओं का आता है। मगर हालात यहां भी खराब है। गौशालाओं में मौजूदा पशुओं के हिसाब से संसाधनों की व्यवस्था की हुई है।

इससे यहां संख्या बढ़ने पर स्थिति बिगड़ने का भय रहता है। रही-सही कसर इस बात से पूरी होती है कि पिछले दो साल से गौशालाओं को जीव जंतु कल्याण बोर्ड की ओर से मिलने वाला सरकारी अनुदान नहीं मिला है।

हर गांव में सौ से अधिक लावारिस पशु
जिले में पच्चीस से तीस हजार की संख्या में लावारिस पशु हैं। शहर में इनकी संख्या आठ हजार के करीब बताई गई है। जिले के हर गांव में औसतन सौ के करीब लावारिस पशु हैं।

इन पशुओं में सांडों की संख्या अधिक है। लावारिस पशुओं के उचित रख-रखाव नहीं होने और सड़कों पर छोड़ देने के कारण गांवों में किसान और शहर में आम व्यक्ति परेशान है। हिसार शहर में ही लावारिस पशुओं के कारण आठ लोगों की मौत हो चुकी है।

यह है समस्या के मुख्य कारण
गौ भक्तों व पशु प्रेमियों की मानें तो लावारिस हालत में घूमने वाले पशुओं की संख्या बढ़ने का मुख्य कारण डेयरियां व क्रॉस ब्रीडिंग हैं।

जींद में बनी एक डेयरी में ही हर साल छह-सात हजार की संख्या में क्रॉस ब्रीडिंग होती है। ऐसे में वहां हर साल दो से तीन हजार पशु ऐसे रह जाते हैं, जो दूध नहीं देते। इससे उनको सड़कों पर छोड़ दिया जाता है।

सरकार ने पशु मेलों पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस कारण अब पशुओं का आदान-प्रदान रुक गया है। नतीजतन लगातार पशुओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

मगर उनको रखने के लिए स्थान की कमी हो गई है। गाय या बैल का कोई खरीदार नहीं मिलने के कारण एक समय बाद पशुपालक बेचने की बजाय पशु को सड़क पर छोड़ रहे हैं।

ऐसे हो सकता है समाधान
विशेषज्ञों की मानें तो गांव-गांव में बाड़े बनाए जाने से इस समस्या पर कुछ हद तक लगाम लग सकती है। या फिर चार-पांच गांव मिलकर संयुक्त गौशाला बना सकते हैं।

राजस्थान के कुछ इलाकों में ऐसी व्यवस्था की गई थी, जहां चार-पांच गांवों ने मिलकर एक गौशाला बनाई और फिर पशुओं को वहां रखकर उनके चारे व अन्य सामान का प्रबंध किया।

हरियाणा राज्य गौशाला संघ की ओर से भी टोहाना में तीन साल पहले ऐसी व्यवस्था की गई कि लोगों ने संयुक्त बाड़ा बनाकर वहां पशुओं को रखा और आसपास के किसानों ने उनके चारे व तूड़ी का प्रबंध कर दिया।

खेतों में फसल को लावारिस पशुओं से बचाने के लिए पूरी रात जाग कर फसल की रखवाली करनी पड़ रही है। फसल के साथ-साथ लावारिस पशु खेतों में उगाई गई सब्जियों को भी खराब कर रहे है। हालात खराब हैं, प्रशासन व सरकार को उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
- जगदीश कुलचानिया, किसान, गांव ढाणी मोहब्बतपुर

रात को खेतों में लावारिस पशु टोलियों के साथ पहुंच जाते हैं और खेत में फसल को तहस-नहस कर देते है। साल दर साल इनकी संख्या बढ़ रही है। अकेला किसान इन पशुओं को खेत से खदेेड़ भी नहीं सकता है। इसलिए समूह बनाकर पहरा देना पड़ता है।
- धर्मपाल शर्मा, किसान, गांव डाबड़ा

इस समय जिले में 38 पंजीकृत गौशालाएं हैं, जबकि तीन-चार नई बन चुकी हैं। गौशालाएं अपनी क्षमता से ज्यादा पशु रखे हुए हैं। सरकार कोई अच्छी योजना बनाकर लावारिस पशुओं की समस्या से किसानों व आम जनता को निजात दिलाए, तो गौशाला प्रबंधन समितियां भी साथ देने को तैयार हैं।
विज्ञापन

- शमशेर आर्य, प्रदेशाध्यक्ष, हरियाणा राज्य गौशाला संघ
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें