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कुदरती कहर के दौरान बचाव कार्य में मेरी कोख में पल रहा बच्चा हिम्मत बना : डॉ. ज्योति

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अपने बेटे विराज के साथ डॉ. ज्योति। संवाद - फोटो : Hisar
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हिसार। देवभूमि उत्तराखंड में कुदरती कहर के दौरान राहत और बचाव कार्य को अंजाम देने में मेरी कोख में पल रहा बच्चा मेरी हिम्मत बना। इसी साल 7 फरवरी को उत्तराखंड स्थित जोशीमठ में ग्लेशियर टूटा तो चारों तरफ तबाही का मंजर था। उस समय मैं 8 महीने की गर्भवती थी। उस मुश्किल घड़ी में किसी ने मेरा साथ दिया तो वह मेरा बच्चा था। अगर यह ठीक नहीं होता तो मैं कुछ नहीं कर पाती। मैंने हिम्मत जुटाई तो मौत और जिंदगी के बीच फंसे 12 मजदूरों की जान बचाई जा सकी। इसका पूरा श्रेय मैं अपने बेटे विराज को देती हूं।
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- जैसा इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस, जोशीमठ में मेडिकल शाखा की असिस्टेंट कमांडेंट एवं सेक्टर 16-17 निवासी डॉ. ज्योति ने संवाददाता पूनम शर्मा को बताया
मजबूत मन का संकल्प और इच्छा शक्ति ही दिलाती है सफलता
नवरात्र पर बेमिसाल बेटियों की सीरीज के तहत फोन पर हुई बातचीत के दौरान 27 वर्षीय डॉ. ज्योति ने अपने संघर्ष के दिनों का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि आठ माह पहले जोशीमठ इलाके में जलप्रलय के समय गर्भवती होने के बावजूद वह तीन दिन तक लगातार ड्यूटी पर रही। हालांकि छुट्टी मंजूर हो चुकी थी, लेकिन अपना कर्तव्य निभाते हुए रेस्क्यू में शामिल हुई। डॉ. ज्योति ने बताया कि 5 से 6 घंटे के बाद आपदा में फंसे 12 मजदूरों को निकालकर अस्पताल लाया गया। इलाज करने के बाद उनकी जान बचाई। उन्होंने बताया कि उनके पति आशीष भी आईटीबीपी में ही असिस्टेंट कमांडेंट इंजीनियर हैं। वह भी सूचना मिलने के तुरंत बाद फील्ड में निकल गए थे। तब बखूबी जिम्मेदारी निभानेवाली डॉ. ज्योति का मानना है कि मजबूत मन का संकल्प और हमारी इच्छा शक्ति ही हमें सफलता दिलाती है।
खुद से ज्यादा अपने काम को प्राथमिकता दी
चुनौतीपूर्ण हालत में खुद के संभालने के सवाल पर उन्होंने बताया कि मेरे मन में था कि मुझे कुछ नहीं होगा, अगर कुछ हुआ तो मेरा परिवार सब संभाल लेगा। उस समय मैंने अपने आप से ज्यादा अपने काम को प्राथमिकता दी। मैंने सोचा इन सबको मेरी ज्यादा जरूरत है और मुझे इनकी जान बचानी है। ऐसे हालात पर किसी ने यूं बयां किया है....
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हार हो जाती है जब मान लिया जाता है,
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।
डॉ. ज्योति ने चुनौतियों के बीच अस्पताल में ये भी किया
- मरीजों को दिमागी तौर पर सपोर्ट करना और काउंसिंलिग करना
- फोन न होने के कारण मरीजों के परिजनों से बात करवाना
- समय-समय पर मरीजों की देखरेख करना
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