हिंदी भाषा के प्रोत्साहन के लिए जरूरी है कि हम अपने घर से ही इसकी शुरुआत करें। बच्चों के सभी तरह के विकास के लिए यह जरूरी है कि उन्हें अपनी मर्जी की भाषा यानी अपनी मातृभाषा में बात करने की आजादी दी जाए। ऐसा ना हो कि स्कूल शुरू करते ही उन पर अंग्रेजी थोप दी जाए। हिंदी को विकट परिस्थितियों से बचाने के लिए जरूरी है कि हमारी आने वाली पीढ़ी हिंदी को जाने। - सुनीता देवी, सहायक प्राध्यापिका, राजकीय महिला महाविद्यालय, हिसार।
संस्कृति पर भी खतरा
पिछले 100 वर्षों में आधी भाषाएं लुप्त हो गई हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल जो 4 हजार भाषाएं हैं, आने वाले 100 वर्षों में उनमें से भी केवल 400 ही बचेंगी। ऐसे में आने वाला समय और भी विकट होगा। हिंदी कमजोर हुई तो हमारी संस्कृति पर भी खतरा मंडरा जाएगा। हालात ये हो गए हैं मॉरिशस और फिजी सहित करीब 15 देशों में हिंदी भाषा बोली जाती थी, लेकिन अब वहां के अधिकतर युवा हिंदी नहीं जानते हैं। यही हाल रहा तो भारत से भी एक दिन हिंदी खत्म हो जाएगी। - डॉ. सुरेंद्र बिश्नोई, सहायक प्राध्यापक, दयानंद महाविद्यालय हिसार।
हिंदी को सर्वोपरि बनाना होगा
हिंदी भाषा के रास्ते में कौन खड़ा है। पहले हमें उन विषयों को तलाशना होगा। हिंदी की दुर्दशा इसी से ही पता लगाया जा सकता है कि संविधान में राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए हम केवल एक ही मत से जीते थे। 1956 में हमसे एक बड़ी गलती हुई। वो यह थी कि हर राज्य ने अपनी अलग भाषा बनाई लेकिन हिंदी को सर्वोपरि भाषा के तौर पर किसी ने नहीं देखा। दक्षिण भारत में हिंदी को सम्मानजनक भाषा की तरफ से नहीं देखा जाता है। हमें पहले पहली से पांचवी कक्षा तक की किताबों को केवल हिंदी भाषा में रखना होगा। ताकि बच्चों का आधार हिंदी भाषा से ही बने। छठी कक्षा के बाद ही अंग्रेजी भाषा से बच्चों को रूबरू करवाने की जरूरत है। कविता सम्मेलन से स्कूलों के बच्चों को जोड़ना चाहिए। ताकि वे हिंदी की नींव को समझ सकें। - देवेंद्र सिंहमार, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी।
आज स्कूल में पीटीएम थी। एक बच्चे के हिंदी विषय में 50 में से 40 नंबर लिए। लेकिन इस चीज को अभिभावक ने नकार दिया और अन्य विषयों में कम अंक आने पर बच्चे को फटकार लगाई। इससे पता चलता है कि हमारे मन में हिंदी भाषा को कितनी तवज्जो दी जाती है। हमें पहले परिवार से हिंदी भाषा बोलने की शुरुआत करनी होगी। तभी हिंदी की दुर्दशा को बदला जा सकता है। अन्यथा वो दिन दूर नहीं हिंदी भाषा हमारे आने वाली पीढ़ी तक लुप्त हो जाएगी। - राखी, हिंदी प्रवक्ता, डीएवी पुलिस पब्लिक स्कूल, हिसार।
मन की बात कहने का सबसे सहज माध्यम है हिंदी
अपनी मन की बात को सरल व सहज रूप से रखने का सबसे अच्छा माध्यम हिंदी भाषा है। अगर हम अपनी बात को हिंदी भाषा के नजरिए से पेश करते हैं तो हमें अलग तरह से संतुष्टि होगी। हिंदी सबसे पुरानी भाषा के साथ-वैज्ञानिक भाषा भी है। इसी भाषा से कई तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। हिंदी भाषा की दूसरी खास बात है कि इसकी ध्वनि स्थाई है। अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में कुछ शब्दों का उच्चारण नहीं किया जाता है। जैसे चाकू को हम अंग्रेजी भाषा में नाइफ कहते हैं। के का उच्चारण लुप्त होता है। लेकिन हिंदी एक ऐसी भाषा है। जिसमें जिस शब्द से बोला जाएगा, वह उसी स्वर या व्यंजन से शुरू होगा। - बिरमा, हिंदी प्रवक्ता, राजकीय मॉडल संस्कृति सीनियर सेकेंडरी स्कूल, हांसी।
सही ढंग से लिखना जरूरी
हम हिंदी बोलते जरूर है। लेकिन सही ढंग से लिखना किसी को नहीं आता है। सबसे बड़ी कमी मात्राओं का ज्ञान न होना है। चाहे हिंदी भाषा का शिक्षक हो या फिर होनहार। कुछ को छोड़कर शेष बुद्धिजीवी वर्ग हिंदी भाषा को सही तरह से लिख भी नहीं पाते हैं। कारण है न तो उन्होंने हिंदी भाषा को गहराई से जाना और न ही व्याकरण को सही ढंग से पढ़ा। परिणाम आज हमारे सामने है। सही व दुरुस्त हिंदी भाषा का ज्ञान कुछ लोगों को ही है, बाकी बस इस भाषा को रोजगार चलाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि हम जो सीखेंगे वो ही पीढ़ी समझेगी और पढ़ेगी। इसलिए हमें अपने गूढ़ तरीके से हिंदी को समझना होगा। तभी हिंदी की स्थिति को सुधारा जा सकता है। - डॉ. अजय राणा, हिंदी प्रवक्ता, सीआर सीनियर सेकेंडरी स्कूल, हिसार।
लेखन कम नहीं हुआ है
1990 के बाद हिंदी भाषा में अनेक बदलाव देखने को मिले हैं। मीडिया-सिनेमा सहित अन्य साधनों के माध्यम से हिंदी को विस्तार दिया। लेकिन उनका प्रारूप बदला। आने वाले समय में 400 भाषाओं का लुप्त होने का खतरा है। अगर हिंदी भाषा की इसी तरह दुर्दशा रही तो संभावित है कि इन लुप्त होने वाली 400 भाषाओं में हिंदी भी हो। लेखन के माध्यम बदले है। लेकिन मैं नहीं मानता कि लेखन कम हुआ है। क्योंकि पहले कॉपियों में लेख लिखा जाता था। आज कंप्यूटरों पर लिखा जाता है। हिंदी भाषा की बड़ी विशेषता है कि एक ही भाषा के कई पर्यायवाची अर्थ है। जबकि अन्य भाषा में ऐसी कोई विशेषताएं नहीं हैं। - धूपेंद्र, हिंदी प्रवक्ता, डाइट मात्रश्याम।