किसान आंदोलन जितना लंबा होता जा रहा है, उतने ही उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। जहां ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल व लालकिला पर धार्मिक झंडा फहराने के अगले दो दिन तक के हालात से आंदोलन सिमटता दिख रहा था, वहीं केवल पांच दिन में धरनास्थल पर दोबारा से दोगुने से ज्यादा किसान हो गए हैं।
अब हालात यह है कि सरकारी रिपोर्ट के अनुसार कुंडली बॉर्डर पर 45 हजार से ज्यादा किसान जमा हैं और वहां किसानों के पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है। इस तरह से किसानों में जोश को देखते हुए नेताओं ने दोबारा से सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। उनको लग रहा है कि जब तक सरकार पर दबाव नहीं बनाया जाएगा, उस समय तक सरकार की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव नहीं मिलने वाला है। इसलिए ही अब केवल एक ही लक्ष्य पर काम किया जा रहा है कि सरकार पर दबाव बनाकर दोबारा से बातचीत शुरू कराई जाए।
कृषि कानून रद्द कराने की मांग को लेकर किसानों ने 27 नवंबर से नेशनल हाईवे 44 के कुंडली बॉर्डर पर डेरा डाला हुआ है। वहां पहले दिन करीब 2 हजार ट्रैक्टर-ट्राली व अन्य वाहनों में 25 हजार किसान पहुंचे थे। उसके बाद से किसान लगातार बढ़ते जा रहे थे और वहां 15 दिन के अंदर किसान दोगुने तक हो गए थे। कुंडली बॉर्डर पर जब धरना शुरू हुआ था तो तब सबसे ज्यादा पंजाब के किसान मौजूद थे और हरियाणा व यूपी वालों का उनको साथ मिल रहा था। यही कारण था कि नेशनल हाईवे 44 पर पड़ाव बढ़कर केजीपी-केएमपी गोल चक्कर तक पहुंच गया था। जिसके बाद किसान लगातार बढ़ते गए और गणतंत्र दिवस पर करीब दो लाख किसान बॉर्डर पर पहुंचे थे।
ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल व लालकिला पर धार्मिक झंडा फहराए जाने के बाद आंदोलन को तगड़ा झटका लगा। कुंडली बॉर्डर से अचानक से किसान घर लौट गए और 28 जनवरी तक आंदोलन सिमटता हुआ दिखाई देने लगा और बॉर्डर पर केवल 20 हजार किसान रह गए थे। उसके अगले ही दिन सरकार की सख्ती व किसान नेताओं की भावनात्मक अपील ने दोबारा से आंदोलन को ऊपर चढ़ाना शुरू कर दिया। यही कारण है कि केवल पांच दिन में कुंडली बॉर्डर पर दोगुने से अधिक किसान हो गए और इस समय वहां 45 हजार से ज्यादा किसान डटे हुए हैं। सरकार को भेजी गई रिपोर्ट तक में यह आंकड़ा बताया गया है कि वहां इस समय करीब 45 हजार किसान मौजूद हैं और किसानों के पहुंचने का सिलसिला जारी है।
कुंडली बॉर्डर पर किसान लगातार पहुंच रहे है और यहां रोजाना हजारों किसान आते है। अब सरकार की यह गलतफहमी भी दूर हो गई है कि सख्ती करने से किसान रुक जाएगा और यह आंदोलन खत्म हो जाएगा। सरकार को अब अपना हठ छोड़कर बातचीत करनी चाहिए और अन्नदाता की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो आंदोलन को आगे तेज किया जाएगा।
गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष, भाकियू, हरियाणा
सरकार को लगता था कि किसान डरकर अपने घर बैठ जाएगा। अब सरकार को खुद भी दिखने लगा है कि किसान इतना कमजोर नहीं है और वह अपने हक के लिए आखिर तक लड़ाई लड़ेगा। इसका नजारा सरकार बॉर्डर पर देख रही है और सरकार की जानकारी में यह सभी बात आ चुकी है। सरकार बातचीत करती है तो किसान भी बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन केवल मुद्दे पर बात होनी चाहिए और सरकार को अवैध रूप से पुलिस की हिरासत में लिए गए किसानों को छुड़वाना चाहिए।
अभिमन्यु कोहाड़, सदस्य, संयुक्त किसान मोर्चा