फतेहाबाद। बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़े मामले में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया है। डीसी एवं न्यायाधिकरण अध्यक्ष डॉ. विवेक भारती ने 65 वर्षीय विधवा महिला की अपने बेटे के नाम की गई जमीन का आंशिक ट्रांसफर रद्द करते हुए उसकी हिस्सेदारी पुनः महिला के नाम दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं।
यह मामला शहर के जगजीवनपुरा निवासी कलावती देवी से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2016 में अपनी करीब 58 कनाल भूमि अपने बेटे विजय कुमार के नाम कर दी थी। उनका कहना था कि पति की मृत्यु के बाद वह बेटे के साथ रह रही थीं और इसी दौरान बेटे ने भरोसा दिलाया था कि वह उनकी सभी मूलभूत जरूरतों, जैसे भोजन, कपड़े, दवाइयां और रहने की व्यवस्था का ध्यान रखेगा। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने अपनी जमीन उसके नाम कर दी थी।
कलावती देवी ने आरोप लगाया कि कुछ समय बाद बेटे ने देखभाल बंद कर दी और उनके साथ मारपीट की और उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद वह अपनी बेटी के पास रहने लगीं। उन्होंने यह भी कहा कि बेटे ने बाद में जमीन का एक हिस्सा अपनी पत्नी के नाम भी कर दिया। वहीं बेटे विजय कुमार की ओर से दलील दी गई कि जमीन का हस्तांतरण पूरी तरह स्वेच्छा से हुआ था और परिवार में किसी प्रकार का विवाद नहीं था।
उसने यह भी दावा किया कि वह आज भी मां की देखभाल के लिए तैयार है। साथ ही यह भी कहा गया कि मां को पिता की फैमिली पेंशन के रूप में करीब 30 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं और वह अपनी बेटी के साथ रह रही हैं। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने सभी दस्तावेजों, रिकॉर्ड और मौके की निरीक्षण रिपोर्ट का अवलोकन किया।
रिपोर्ट में पाया गया कि महिला वर्तमान में अपनी बेटी के साथ रह रही है जबकि मकान का ऊपरी हिस्सा किराए पर दिया गया है। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायाधिकरण ने माना कि जमीन का हस्तांतरण इस भरोसे पर किया गया था कि बेटा मां की देखभाल करेगा लेकिन वर्तमान स्थिति में ऐसा नहीं हुआ। इस आधार पर वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण संबंधी कानून के प्रावधान लागू किए गए।
न्यायाधिकरण ने अधीनस्थ न्यायाधिकरण के आदेश में संशोधन करते हुए 19 मई 2016 के हस्तांतरण दस्तावेज को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। साथ ही आदेश दिया कि कलावती देवी के हिस्से की भूमि पुनः उनके नाम दर्ज की जाए।
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बेटे का दावा- परिवार में कोई विवाद नहीं
बेटे ने दावा किया है कि भूमि का हस्तांतरण स्वेच्छा से किया है। आज भी वह मां की देखभाल के लिए तैयार है। मां को पारिवारिक पैंशन के रूप में 30 हजार रुपये भी मिल रहे हैं। पर न्यायाधिकरण ने उसके दावे को खारिज करते हुए कहा कि घर का ऊपरी हिस्सा किराये पर दिया हुआ है। इसी से लगता है कि लगता है वह अपने किए गए वादे पर खरा नहीं उतर रहा है। इस पर न्यायाधिकरण ने भूमि हस्तातंरण दस्तावेज को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है।