श्रीसनातन धर्म मंदिर में आयोजित कथा में मौजूद श्रद्वालु
फतेहाबाद। अगर भक्त सच्चे मन से भगवान का सिमरन करके उनको पुकारता है तो भगवान अपने भक्तों का कष्ट हरने में देर नहीं लगाते और उसी समय दौड़े चले आते हैं। यह बात हरिद्वार के भागवत मार्तंड स्वामी यमुनापुरी महाराज ने कही। वे मोहल्ला रामनिवास में स्थित श्रीसनातन धर्म मंदिर में पंडित तुलसीदास रामानंद सरस्वती के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में स्वामी गोपालानंद के सानिध्य में आयोजित कृष्ण कथा में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रवचन दे रहे थे।
इस दौरान समाजसेवी महेंद्र मुटरेजा बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। प्रवचन करते हुए महाराज ने कहा कि अगर हम मंदिरों में ध्यान से देखें तो 90 प्रतिशत परमात्मा की प्रतिमा खड़ी हुई मिलती हैं जोकि हमें संदेश देती है कि भगवान अपने भक्त की सहायता करने को सदैव दोनों पांवों पर खड़े रहते हैं। उन्होंने द्रोपदी के चीरहरण की कथा सुनाते हुए कहा कि जब दुशासन द्रोपदी का चीरहरण कर रहा था तो भगवान श्रीकृष्ण को द्रोपदी ने पुकारा तो भगवान ने उसका चीर बढ़ाकर उसकी भरी सभा में रक्षा करने का काम किया।
यमुनापुरी महाराज ने कहा कि मंदिर में जाएं तो पहला प्रणाम मंदिर की देहरी को करें उसके बाद भगवान को प्रणाम करें। क्योंकि भगवान के भक्तों और संतों के पांवों की रज हमें मंदिर की देहरी पर ही मिलती है। उन्होंने कहा कि भगवान को पत्थर की मूर्ति समझकर प्रणाम न करें, भगवान समझकर करें। अगर हमारी श्रद्धा पक्की होगी तो पत्थर से भी परमात्मा प्रगट हो जाते हैं। इस दौरान उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के 8 विवाह और उसके बाद 16 हजार 100 विवाह की कथा भी विस्तार से सुनाई। महाराज ने कहा कि जब हम वृंदावन जाते हैँ तो अक्सर देखते हैं कि वहां के बंदर लोगों का चश्मा उतार लेते हैँ। उन्होंने कहा कि चश्मा उतरने वाले बंदर ज्ञान देते है कि बांके बिहारी जी को देखने के लिए बाहर की नजर की जरूरत नहीं है अपितु अंदर की आंखों को खोलने की जरूरत है। इस दौरान समाजसेवी ओमप्रकाश सरदाना, डॉ. सुमन बजाज, पूर्णचंद बजाज, वेद प्रकाश नारंग, पार्षद किरण नारंग, संजय गोस्वामी पीएनबी वाले, भारतभूषण गर्ग, बबलू जिंदल, अंशुल भारद्वाज, पवन आहूजा एडवोकेट, संजीव गोस्वामी, नीरज शर्मा बतौर विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे। मंच संचालन राजकुमार मदान ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में मंदिर प्रबंधन कमेटी के लख्मीचंद सरदाना, प्रवीण जिंदल, जगत रूखाया, डॉ. हंसराज कथूरिया, विजय बांगा, योगेश मेहता, ललित शुक्ला, हरीश कथूरिया का योगदान रहा।