हरियाणा के फतेहाबाद के भूना खंड के गांव भट्टू के ऐतिहासिक कर्ण कोट टीले से मध्यकालीन युग की गणेश की अष्ट धातु की मूर्ति मिली है। यह मूर्ति हालांकि थोड़ी विखंडित हो गई है, लेकिन कर्ण कोट टीले से इसका मिलना इस बात का प्रमाण है कि हड़प्पा काल से लेकर मध्यकालीन युग तक यहां पर लोगों का निवास था।
भट्टू में शुक्रवार को जब गांव का किसान रिछपाल अपने खेत में सिंचाई कर रहा था तो एक मूर्ति उभरकर सामने आई। जब उसने देखा तो यह श्री गणेश की मूर्ति थी। उसने तुरंत इसकी सूचना सेफ्टी इंजीनियर अजय कुमार को दी। अजय कुमार ने इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को दी। पुरातत्व विभाग के अनुसार, यह मूर्ति मध्यकालीन युग की है और कम से कम 650 ईस्वी की हो सकती है। बाकी अभी इसकी जांच की जाएगी।
टोहाना से पहले भी मिल चुकी हैं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं
प्राचीन भारत में पहले टोहाना का नाम तोषाण था। समय के साथ-साथ तोषाण का नाम बदलकर टोहाना हो गया। कर्ण कोट टीला इसी टोहाना उपमंडल के भूना क्षेत्र में है , जिससे अब ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं सामने आने लगी है। करीब 8 साल पहले शोधार्थी सेफ्टी इंजीनियर अजय कुमार यहां पर आए तो उनको कुछ ऐसे अवशेष मिले जो काफी पुराने थे।
इसके बाद उन्होंने इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को दी। इस स्थान पर हाथी दांत की चूड़ियां, कांच की चूड़ियां, गुप्त काल की मदनिका की मूर्ति, महाभारतकालीन ग्रेवियार्ड ऑब्जेक्ट, रोशनी में चमकने वाली मणि, प्राचीन शिवलिंग सहित अनेक पुरातात्विक महत्व के सामान मिल चुके हैं।
नवग्रहों की पूजा के लिए होती थी प्रयोग
सेफ्टी इंजीनियर अजय ने बताया कि मध्यकालीन युग में ग्रहों के प्रधान धातुओं को मिलाकर देवी देवता की मूर्ति बनाई जाती थी और नवग्रह शांति पूजा की जाती थी। इस टीले पर इस मूर्ति का मिलना बताता है कि यहां रहने वाले लोग मूर्ति पूजक थे। मध्यकालीन युग में कर्मकांड प्रधान समाज रहा था, यह इसका भी प्रमाण है। कर्ण कोट टीला सरस्वती नदी के तट पर स्थित है और यहां सरस्वती नदी के बहाव के निशान भी मिल रहे हैं।
कर्ण कोट टीला अपने आप में ऐतिहासिक महत्व से जुड़ा हुआ है। इस टीले से महाभारत काल के अवशेष तो मिलते ही रहते हैं, साथ ही हड़प्पा संस्कृति व एंग्लो-सिख युद्ध के प्रमाण भी यहां पर मिले हैं। अक्सर बारिश व सिंचाई के समय यहां पर ऐसे ऐतिहासिक महत्व के अवशेष मिल जाते हैं।
-अजय कुमार, शोधकर्ता एवं सेफ्टी इंजीनियर।
कर्ण कोट टीले से जो मूर्ति मिली है, यह मध्यकालीन युग की प्रतीत हो रही है। यहां पर पहले भी कई अवशेष मिल चुके हैं और यह मूर्ति मिलना इस बात का सबूत है कि यहां पर कभी बड़ी सभ्यता पनपी हुई थी।
-बुनानी भट्टाचार्य, उप निदेशक, पुरातत्व विभाग, चंडीगढ़।