जिले में हर साल करीब 18 हजार बच्चे जन्म ले रहे हैं। इसमें करीब डेढ़ हजार ऐसे बच्चे हैं जिन्हें जन्म के बाद नर्सरी में ले जाने की जरूरत पड़ती है लेकिन हैरानी की बात ये है कि नन्हीं जान के उपचार के लिए जिले के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं। जिले में एक भी विशेषज्ञ नहीं है। जिला नागरिक अस्पताल में ही पांच माह से शिशु रोग विशेषज्ञ का पद खाली पड़ा है।
मेडिकल ऑफिसरों के सहारे नागरिक अस्पताल की नर्सरी चल रही है। 2019 में 1063 शिशुओं को नर्सरी में ले जाया गया, यहां पर 87 बच्चों की मौत हो गई, 2020 में 777 शिशुओं में से 102 की उपचार के दौरान मौत हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों की माने तो यहां पर कोई भी शिशु रोग विशेषज्ञ आने को तैयार नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण ये ही है कि सैलरी कम है जबकि निजी अस्पताल तीन गुना दे रहे हैं।
वर्ष नर्सरी में दाखिल शिशु मौत
2019 1063 87
2020 777 102
सरकारी और निजी अस्पताल में वेतन भारी अंतर
सरकारी और निजी अस्पताल के वेतन भारी अंतर है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की माने तो एनएचएम के तहत एक लाख रुपये विशेषज्ञ को वेतन देने का प्रावधान है। शिशु रोग विशेषज्ञ के पद को लेकर कई बार विज्ञापन भी जारी हो चुका है लेकिन कोई डॉक्टर आने को तैयार नहीं है। इसके पीछे मुख्य वजह ये है कि निजी अस्पतालों में तीन लाख रुपये तक का पैकेज मिल रहा है।
महामारी में 9 दिन से 12 साल के बच्चे हुए संक्रमित
कोरोना की दूसरी लहर में 9 दिन से लेकर 12 साल तक के सैकड़ों शिशु संक्रमित हो चुके हैं। बच्चों में सांस लेने की ज्यादा दिक्कतें रहीं हैं और रिकवरी होने में ज्यादा समय लगा है। इसके पीछे मुख्य कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना रहा है।
कोट
अस्पताल में डॉक्टरों की कमी को लेकर उच्च अधिकारियों को लिखा जा चुका है। अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ न होने का मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में लाया जा चुका है।
- डॉ. राजेश चौधरी, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी।