सीमा पर विदेशी दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले जांबाज अपने ही देश के धोखेबाजों से हार गए। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद आशियाने की आस लेकर अपनी जिंदगीभर की कमाई बिल्डर को दी, लेकिन वह धोखेबाज निकला। त्रिवेणी इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट में फ्लैट लेने के लिए पैसा देने वाले पूर्व सैनिकों की जीवनभर की जमा-पूंजी चली गई और आशियाना भी नसीब नहीं हुआ।
त्रिवेणी बिल्डर के प्रोजेक्ट में बीएसएफ के 240 जवानों ने भी फ्लैट बुक कराए थे। इस बिल्डर के खिलाफ अब तक धोखाधड़ी व अन्य आरोपों के जिले में 55 मामले दर्ज हो चुके हैं।
केस-एक
कानपुर में कमांडिंग ऑफिसर रहे रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन एसएस भाटिया ने 1965 व 71 की लड़ाई में अहम योगदान दिया था। रिटायर होने के बाद उन्होंने द्वारका में एक फ्लैट खरीदा। त्रिवेणी का विज्ञापन देखकर उन्होंने द्वारका का फ्लैट बेच अपने बेटे (डॉ. अमरजीत भाटिया) व बेटी (गुरमीत पुरी) के नाम सेक्टर-78 में त्रिवेणी ग्लैक्सी के टावर-15 में 2007 में फ्लैट बुक करा दिया। इसके 32-32 लाख रुपये उन्होंने दे दिए, लेकिन 80 फीसदी कीमत चुकाने के बाद धोखाधड़ी का अहसास हुआ।
केस-दो
बिग्रेडियर एसएन सेतिया ने 1969 से 2004 तक कई लड़ाइयां लड़ीं। रिटायर होने के बाद उन्होंने 2006 में सेक्टर-78 में त्रिवेणी के प्रोजेक्ट में जमा पूंजी लगा दी। उन्होंने टावर नंबर-15 में फ्लैट बुक करा 30 लाख रुपये भुगतान किया है। अब उन्हें पता चला कि यह प्रोजेक्ट पुलिस, राजनीतिज्ञों और बिल्डर की सांठगांठ की भेंट चढ़ गया है। उन्होंने बताया कि बिल्डर को झूठे कागजों के आधार पर लाइसेंस जारी होने का पता चलने पर वे जून माह में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के महानिदेशक अनुराग रास्तोगी से मिले थे। उन्होंने प्रोजेक्ट को सरकार की ओर से ओवरटेक करने गुहार लगाई, पर कुछ नहीं किया गया।
केस-तीन
बिगेडियर अवतार सिंह का कहना है कि उन्होंने पूरा जीवन आंतकियों से लड़ते हुए ही गुजारा है। कश्मीर से नागालैंड तक कोई ऐसा राज्य नहीं बचा, जहां देश की सेवा करने नहीं गए हों। उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि रिटायमेंट के बाद सारी पूंजी बिल्डर हड़प लेगा। वर्ष 2003 में रिटायर होने के बाद त्रिवेणी गैलेक्सी का विज्ञापन देख 2008 में 30 लाख का फ्लैट बुक कराया था। इसमें से 28 लाख कर भुगतान किया जा चुका है, लेकिन आशियाना नहीं मिला।