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बेरहम विकास की भेंट चढ़े तालाब

Thu, 19 Dec 2013 08:51 PM IST
अमर उजाला फरीदाबाद
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लगभग चार सौ साल पुरानी शेख फरीद की नगरी फरीदाबाद की प्राकृतिक स्थालाकृति (टोपोग्रॉफी) बेरहम विकास की भेंट चढ़ गई। इसकी वजह से आज पानी पाताल में चला गया और बारिश में जलभराव से शहर त्राहि-त्राहि करता है। शहर के लगभग सभी तालाबों, जोहड़ों को अनियोजित विकास निगल गया।
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कुछ को लोगों की लालच खा गई और कुछ को बिना सोचे समझे विकास करवाने वाले अधिकारी। पहले लोग जल देवता को पूज्य मानते हुए तालाबों की पूजा-अर्चना करते थे। आज भी शहर सेलगे ग्रामीण क्षेत्रों में मंगल कार्यों के मौके पर महिलाएं एकत्र होकर तालाबों को पूजती हैं। ओल्ड फरीदाबाद का तालाब अब खत्म हो गया है, लेकिन उसका यश इतना है कि अब भी वहां एक सड़क तालाब रोड के नाम से जानी जाती है। भू-जल बोर्ड एवं जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों का कहना है कि तालाब और जोहड़ भू-जल के प्राकृतिक स्रोत थे। इनके खत्म होने के कारण भू-जल स्तर भी कम होने लगा है। शहर के कुछ चुनिंदा तालाबों की स्थिति पर पेश है संवाददाता ओम प्रकाश व फोटोग्राफर गौरव चौधरी की रिपोर्ट।

- पिछले लगभग दो दशक में शहर का तेजी से विकास हुआ। मुजेसर, अजरौंदा, ओल्ड फरीदाबाद व बल्लभगढ़ के तालाबों पर पहले आसपास के लोग मिट्टी और कूड़ा करकट डालकर भरते रहे। चारो तरफ से लोगों ने पहले तालाबों को छोटा किया और फिर नगर निगम ने उन्हें पाटकर सार्वजनिक प्रयोग के किसी स्थान में तब्दील कर दिया। लगभग हर जोहड़ के साथ यही हुआ।
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1-ओल्ड फरीदाबाद का बराही तालाब शहर के सबसे पुराने तालाबों में गिना जाता रहा है। यहां बराही माता की पूजा होती थी। पहले इसमें लबालब पानी भरा रहता था। लोग इसमें नहाते थे। मान्यता थी कि इसमें नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे इसका पानी सूखने लगा। यह सिर्फ मानसून के समय भरने लगा। इसके बाद नगर निगम ने इसमें पार्क बना दिया। बराही माता की पूजा अब भी हो रही है। बच्चों के नहाने के लिए एक छोटी सी पक्की जगह बनवा दी गई है।

2-मुजेसर गांव में भी एक तालाब हुआ करता था। जिस पर नगर निगम ने कम्युनिटी सेंटर और डिस्पेंसरी बनवा दी।

3-अजरौंदा गांव में एक बड़ा तालाब हुआ करता था जो इस समय कूड़े से पट गया है। अक्तूबर-नवंबर में इसके कुछ हिस्से में बैठकर लोग रामलीला देखते हैं।

4 इसी प्रकार बल्लभगढ़ की चावला कॉलोनी स्थित दो जोहड़ों को पाटकर उन पर पार्क बना दिए गए हैं। सारन गांव का तालाब भी विकास की अंधी दौड़ की भेंट चढ़ गया।  

‘बड़खल, सूरजकुंड जैसी झीलों एवं शहर के तालाबों के सूखने की वजह से भू-जल स्तर गिरा है। प्राकृतिक स्रोतों को खत्म करने का खामियाजा किसी न किसी रूप में आदमी को ही भुगतना पड़ता है। तालाब और जोहड़ रहते तो आज शहर की सड़कों पर इतना जलभराव नहीं होता’।
-आरके खुराना, पूर्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल, जीएसआई

नगर निगम के पूर्व मुख्य नगर योजनाकार एससी कुश का तर्क है कि पहले गांवों में खराब पानी निकासी का स्थान नहीं होता था। जलापूर्ति नहीं थी इसलिए तालाब बनते थे। शहरीकरण के साथ-साथ गांवों में पानी निकासी का इंतजाम हुआ। जलापूर्ति लाइनें बिछीं तो इनका महत्व खत्म होता चला गया।
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शहर की पूर्व मेयर व पार्षद अनिता गोस्वामी का कहना है कि तालाब आबादी के बीच में गंदगी बन गए थे। छोटे बच्चों के गिरने का खतरा था इसलिए पटवाए गए।

- ओल्ड फरीदाबाद निवासी प्रवेश मेहता का कहना है कि अनियोजित विकास की वजह से तालाब खत्म हो गए। इन्हें पक्का करके संरक्षित रखा जा सकता था।

- अजरौंदा निवासी वीरेंद्र गौड़ का कहना है कि जोहड़ों व तालाबों से पशु-पक्षियों को भी पानी मिल जाता था। अब पक्षियों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं बची।

- इस समय सूरजकुंड क्षेत्र में पानी 350 से 400 फुट, एनआईटी में 150 से 200, सेक्टर 14-15 की तरफ 120 और नहरपार 80 फुट पर पानी मिल रहा है।
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