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अमर उजाला खास खबर:
अंतिम गांठों की गुणवत्ता सही नहीं होने से पूरी पैदावार के रेट पर पड़ता है असर, सुबह ओस खत्म होने के बाद ही चुगाई शुरू करें किसान
संवाद न्यूज एजेंसी
चरखी दादरी। किसान सुबह सूरज निकलने व ओस खत्म होने के बाद ही कपास की चुगाई करें। कपास की अंतिम चुगाई की गांठें यानी रूई अलग से रखें। इससे कपास की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती, जिससे पूरी फसल का रेट प्रभावित होता है।
बता दें कि इस समय कपास की चुगाई का काम जोरों पर है। इस बार कपास की मध्यम पैदावार होने की उम्मीद है। कपास में इस मौसम में टींडा में एंथेगनोज रोग लगने का खतरा ज्यादा बना रहता है। इस रोग में टींडा गलने लगता है। फंफूंदी भी लग जाती है। कपास को किसान के लिए खरीफ सीजन की नकदी फसल माना जाता है। कपास की फसल उत्तरी हरियाणा को छोड़कर प्रदेश के तकरीबन सभी भागों में होती है। इस बार कपास की फसल रोगों की जकड़ में रही।
अगस्त व सितंबर माह में मानसून की बारिश होने से कपास की खेती में नुकसान हुआ है। ज्यादा बारिश से कपास में जड़ गलन रोग लग जाता है। चरखी दादरी, भिवानी, हिसार, महेंद्रगढ़, नारनौल, रेवाड़ी, सिरसा जींंद, कैथल सहित कई जिलों में भी कपास की खेती होती है। किसानों ने गत अप्रैल माह में गेहूं की कटाई होते ही मई माह में ही कपास की बिजाई कर दी थी। जून व जुलाई माह में हुई बारिश से पहले किसानों ने कपास की नलाई कर दी थी।
- जलभराव होने से जड़ गलन रोग लगा
अगस्त व सितंबर माह में ज्यादा मात्रा में बारिश होने से कपास में जड़ गलन रोग का प्रकोप बन गया। व्हाइट ट्रस्ट रोग का प्रकोप भी फसल में बना है। कपास में मुख्य रूप से आठ प्रकार के रोग लगते हैं जो कपास के लिए बेहद घातक साबित होते हैं। ज्यादा बारिश व मौसम में नमी की मात्रा अधिक होने की वजह से ये रोग ज्यादा लग सकते हैं।
किस रोग के कपास में क्या हैं लक्षण
कपास में लगने वाले प्रमुख रोगों में कोणधार रोग, गायोथिरियस रोग, एंथेगनोज रोग में टींडा पर फंफूंदी बन जाती है। पीले रंग के धब्बे होने लगते हैं। पैराविल्ट रोग में पौध के पत्ते मुरझा जाते हैं। पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इसे सूटामार रोग भी कहते है। इसी प्रकार, कपास में टींडा गलन रोग का इस मौसम में अंदेशा बना रहता है। इस रोग में टींडा गलने लगता है। एक अन्य बीमारी जड़ गलन रोग है, जिससे 24 घंटे में पौधा नष्ट हो जाता है। देसी कपास में उखेड़ा रोग लगता है। इस रोग में पत्ते किनारों से पीले रंग के हो जाते हैं। पौध की भोजन प्रक्रिया रुक जाती है। कपास में लगने वाला अंतिम रोग पत्ती मरोड़ होता है जो सफेद मक्खी से फैलता है।
वर्सन:
कपास की चुगाई ओस में न करें। सूर्योदय होने के बाद ओस खत्म होने के बाद चुगाई करें। टींडा गलन का विशेष ध्यान रखें। इस रोग में टींडा गल जाता है। मंडी में बढिय़ा भाव लेने के लिए कपास की गांठों का उचित रखरखाव करें।
-डॉ. जितेंद्र सिहाग, कृषि विकास अधिकारी
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चरखी दादरी के खेतों में खड़ी कपास की फसल। संवाद