2020 से शुरू हुआ जातीय भेदभाव
फाइनल नोट के मुताबिक यह उत्पीड़न साल 2020 में अंबाला के एक मंदिर में जातीय भेदभाव की घटना से शुरू हुआ और लगातार बढ़ता गया। उन्हें झूठे केसों में फंसाने की धमकी दी गई, उनके वाहन और आवास संबंधी अधिकारों से वंचित किया गया, और गोपनीय दस्तावेज मीडिया में लीक कर उनकी प्रतिष्ठा धूमिल की गई। डीजीपी शत्रुजीत कपूर ने न सिर्फ अन्य अधिकारियों को मेरे खिलाफ उकसाया बल्कि मेरे एसपी रोहतक नरेंद्र बिजारणिया के जरिए भी मेरी प्रतिष्ठा धूमिल करने की कोशिश की। पूरण कुमार ने अपने नोट में यह भी लिखा कि वे अब अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और चाहते हैं कि उनके साथ जो हुआ, वैसा किसी ईमानदार अधिकारी के साथ न हो।
यह भी पढ़ें: एडीजीपी की मौत पर पत्नी का बड़ा एक्शन: हरियाणा पुलिस के डीजीपी और एसपी के खिलाफ दी शिकायत, कार्रवाई की मांग
मंदिर के दाैरे से नाराज हुए थे पूर्व डीजीपी
फाइनल नोट के मुताबिक जाति आधारित भेदभाव, सार्वजनिक अपमान, लक्षित मानसिक उत्पीड़न और अत्याचार की शुरुआत पूर्व डीजीपी मनोज यादव ने की थी। साल 2020 में अंबाला में एक पुलिस स्टेशन में मैंने एक मंदिर का दौरा किया था।इससे वह इतने खफा हो गए कि उन्हें झूठे केसों में फंसाने की धमकी दी गई, उनके वाहन और आवास संबंधी अधिकारों से वंचित किया गया और गोपनीय दस्तावेज मीडिया में लीक कर उनकी प्रतिष्ठा धूमिल की गई।
तत्कालीन गृह सचिव राजीव अरोड़ा पर आरोप लगाते हुए उन्होंने लिखा कि उन्होंने समय पर अर्जित अवकाश की मंजूरी नहीं दी, जिसके कारण मैं अपने पिता के निधन से पहले उनसे मिलने नहीं जा सका। इसकी अपार पीड़ा आज भी है। इसको लेकर भी सभी वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
मनोज यादव के बैचमेट टीवीएसएन प्रसाद, आईएएस (सेवानिवृत्त) और तत्कालीन डीजीपी पीके अग्रवाल (सेवानिवृत्त) ने भी मेरे खिलाफ इसी तरह का व्यवहार जारी रखा, इस पर भी मेरी शिकायतें आधिकारिक रिकॉर्ड में हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। मेरी सभी शिकायतें और अपील सबूत हैं, जो मेरे खिलाफ जारी मानसिक उत्पीड़न और अत्याचार को दर्शाते हैं।
डॉ. एमएफ किरण, आईपीएस (1996) ने एक एक्स-कैडर पोस्ट पर तैनात करने के लिए मुझे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। इस संबंध में गोपनीय पत्रों को गलत तरीके से पेश किया गया और पूरी प्रक्रिया में अनिवार्य समय सीमा का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया गलत हो रही है। इस संबंध में 13 मार्च 2025 को सूचना मिली कि यह मामला सरकार के विचाराधीन है, हालांकि आज तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वे लिखते हैं कि उन्होंने कुछ समानता के मुद्दे उठाए थे, जैसे कि अर्जित अवकाश की समय पर स्वीकृति, पात्रता के अनुसार सरकारी वाहन व सरकारी आवास का आवंटन, कैडर प्रबंधन के लिए गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को नियमानुसार लागू करना और आईपीएस अधिकारियों के लिए पूजा स्थलों के लिए पीपीआर नियमों को सामान रूप से लागू करना। मगर इन मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय, मेरे ही खिलाफ दुर्व्यभावना से कार्रवाई की जाने लगी।