भिवानी। जिले में जिन संस्थाओं के पास सेहत की सुधार का जिम्मा है, वह खुद बीमार हैं। जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) तक में चिकित्सक नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज की ओपीडी भी चालू नहीं हो सकी है। ऐसे में लोगों की सेहत में सुधार करना बड़ा मुद्दा है। लोगों का कहना है कि जिले के सरकारी अस्पताल तो सिर्फ रेफरल केंद्र बनकर रह गए हैं। यहां आने वाले घायल या गंभीर मरीजों को यहां से दूसरे सरकारी अस्पताल में भेजकर विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है।
जिले की आबादी 12.5 लाख से अधिक है। इसके बावजूद जिला नागरिक अस्पताल में कई चिकित्सकों के कक्ष सालभर से बंद हैं, क्योंकि इनमें चिकित्सक ही तैनात नहीं हैं। इसकी सूचना संबंधित कक्ष के बाहर स्थायी तौर पर लगा दी गई है। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी का सीधा असर ओपीडी पर पड़ रहा है। क्योंकि सभी बीमारियों का उपचार नागरिक अस्पताल की ओपीडी में नहीं मिल रहा है।
जिले के स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों के 239 पद स्वीकृत हैं। इनमें से केवल 104 चिकित्सक ही तैनात हैं, जबकि 135 चिकित्सकों के पद लंबे अर्से से खाली हैं। जिला नागरिक अस्पताल की ओपीडी में भी रोजाना 1,200 से अधिक मरीज आते हैं। मेडिकल कॉलेज की ओपीडी अभी शुरू नहीं हुई है। इसके लिए कोई नया चिकित्सक नहीं मिला है। जिले के चिकित्सकों को ही प्रतिनियुक्ति पर वहां तैनात किया गया है।
स्वास्थ्य विभाग के पास तकनीकी संसाधनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बिना डॉक्टर के ये संसाधन अनुपयोगी हो रहे हैं। इसी कारण यहां जांच के बाद मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेज दिया जाता है। अधिकतर सरकारी अस्पताल सिर्फ रेफरल केंद्र बनकर रह गए हैं। ऐसे में सरकार को पहले स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त कराना होगा। तभी जरूरतमंद लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ पहुंचेगा। -सुरेश सैनी, सामाजिक कार्यकर्ता।
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक ही नहीं हैं। संसाधनों के बूते चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर तो बनाया जा सकता है, लेकिन बिना चिकित्सक के इनका लाभ लोगों तक नहीं पहुंचाया जा सकता। इस कारण वहां मामूली बीमारियों का ही उपचार मिल पाता है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए रोहतक और दिल्ली जाना पड़ता है। चिकित्सकों के पद भरे जाने तक अस्पतालों में लोगों को इलाज मिल पाना मुश्किल होगा। -चिंटू लेघा।
लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सरकार चिकित्सा सुविधा दिलाने में विफल रही है। जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी जुटाई गई तो स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों समेत कई अन्य कर्मचारियों के पद खाली होने का पता चला। ग्रामीण अस्पतालों में चिकित्सक ही नहीं हैं। ग्रामीण चिकित्सकों को प्रतिनियुक्ति पर जिला मुख्यालय भेजा गया है। -बृजपाल सिंह परमार, अध्यक्ष, स्वास्थ्य शिक्षा सहयोग संगठन।
गांवों के पीएचसी में न जरूरी दवाइयां मिलती हैं और न ही डॉक्टर। यहां जाने पर बुखार तक की दवाई भी बाहर से लानी पड़ती है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र केवल टीकाकरण तक सीमित हैं। हर बीमारी का इलाज कराने के लिए जिला मुख्यालय या दूसरे जिलों में जाना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में हर साल डॉक्टर घट रहे हैं और नए निजी अस्पताल खुल रहे हैं, जिसकी वजह से चिकित्सा और उपचार दोनों ही महंगे हो रहे हैं। -प्रवीन बूरा, छात्र नेता।