करीब एक दशक बाद गधे-घोड़ों में पाई जाने वाली ग्लेंडर बीमारी का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है। लाइलाज बीमारी के यमुनानगर और सोनीपत में केस सामने आने के बाद भिवानी में भी हाई अलर्ट घोषित किया गया है। इस बीमारी में एक्ट के तहत पीड़ित गधे-घोड़े को मारकर जमीन में नीचे दबाने का प्रावधान है। गधे-घोड़ों से यह बीमारी आसपास रहने वाले लोगों में फैलती है।
अंग्रेजों के जमाने में घोड़ों में ग्लेंडर बीमारी फैली थी। लाइलाज इस बीमारी के कारण उस समय ग्लेंडर एंड पारसी एक्ट बनाया गया था। इसके तहत बीमारी से पीड़ित घोड़ों को गोली मारने और जमीन में गहराई तक दबाने का प्रावधान किया गया था। एक्ट का उल्लंघन करने वालों पर भी सजा का प्रावधान था। अब एक दशक बाद फिर से ग्लेंडर बीमारी का खतरा मंडराने लगा है। सोनीपत और यमुनानगर में इस बीमारी के केस सामने आए हैं। चूंकि भिवानी में भी काफी संख्या में अश्व प्रजाति के पशु गधे, घोड़े, खच्चर हैं तो इस कारण भिवानी में हाई अलर्ट घोषित किया गया है। डिप्टी डायरेक्टर को निर्देश दिए गए है कि घोड़े, खच्चरों, गधों के सैंपल लेकर जांच के लिए राज्य पशु प्रयोगशाला सोनीपत भेजे जाए। यहां से सैंपलों को जांच के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र हिसार भेजा जाएं।
जरूरी है सावधानी
वैसे तो यह एक वायरल बीमारी है और इसके वायरस का तोड़ अभी तक पशु चिकित्सक नहीं ढूंढ पाए है। इस कारण पीड़ित गधे-घोड़े को मारकर जमीन में गहराई तक दफनाया जाता है। मगर जब पुष्टि न हो और सिर्फ लक्षण लगे उसे पशु को अन्य पशुओं से अलग रखे। इनका झूठा चारा-पानी किसी अन्य पशु से अलग रखे। उसका इलाज करने व देखरेख करने वाला भी अन्य पशुओं से अलग रहे। बार-बार हाथ धोकर साफ रखे।
मानव शरीर पर प्रभाव
यह बीमारी जितनी गधे-घोड़ों के लिए घातक है, उतनी ही मानव शरीर के लिए घातक है। इससे पीड़ित व्यक्ति को हमेशा हलका बुखार रहता है। बांझपन की शिकायत होती है। सबसे खतरनाक यह एक पशु से दूसरे पशु और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।
एक्सपर्ट व्यू: ग्लेंडर वायरस है घातक
ग्लेंडर बीमारी एक वायरल बीमारी है। इसका वायरस बहुत खतरनाक है और अधिकतर समय जानलेवा साबित होता है। पशु चिकित्सक डा. विजय सनसनवाल ने बताया कि इस वायरस का अभी तक कोई इलाज सामने नहीं आया है। बीमारी से बचाव का एक ही उपाय है कि पीड़ित जानवर की तुरंत पहचान हो और उसे दूर रखा जाए।