भिवानी। कुछ भी नहीं है मुश्किल, गर ठान लीजिये...। उद्यमी अनू अग्रवाल ने इन अल्फाज को कुछ इस अंदाज में जीया कि कामयाबी उनके कदम चूमती चली गई। पैसा नहीं था तो लोन लिया और फैक्ट्री शुरू की। लोन के आधे पैसे में फैक्टरी को इतना मुनाफे में ले आईं कि ऋण चुकता कर कामयाबी का सफर शुरू किया। उनकी कामयाबी का टर्नओवर आज पांच करोड़ तक पहुंचा चुका है। देश का शायद ही कोई राज्य होगा, जहां मैडम की फैक्ट्री के बने पर्दे, बेड शीट की मांग न हो।
जिले भर में ढाई हजार छोटी बड़ी फैक्ट्रियों में अनू अग्रवाल इकलौती महिला उद्यमी हैं। वे दो फैक्ट्री संभालती हैं, एक स्वर्ण सिंथेटिक्स और दूसरी श्याम टेक्सटाइल। टेक्सटाइल में बीटेक अनू इंडीपेंडेंटली फैक्टरी संभालती हैं। फैक्ट्री के टेक्नीकल मसलों से लेकर कपड़े की डिजाइनिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग आदि मामले खुद ही देखती हैं। इस मुकाम तक पहुंचने में अनू की मेहनत व लग्र काबिले तारीफ है। टीआईटीएम से बीटेक करने वाली अनू बताती हैं कि 1998 में फैक्ट्री लगाने का विचार आया। पैसों की दिक्कत थी, तो लोन लेने की योजना बनी। 45 लाख का लिया। जमीन खरीदी और 1999 में प्लास्टिक प्लांट लगाया। शुरूआत इतनी अच्छी रही कि लोन की आधी राशि में ही काम चल गया। दो साल के बाद लगा कि टेक्सटाइल सेक्टर में हाथ आजमाने चाहिए। लोन लेकर स्वर्ण टेक्सटाइल की नींव रखी। टेक्सटाइल में आने का फैसला इतना माफिक रहा कि श्रीश्याम टेक्सटाइल के नाम से एक और प्लांट लगाया। लोन लेकर शुरू की गई फैक्टरी का टर्न ओवर आज पांच करोड़ तक पहुंच गया। दोनों प्लांट में प्रतिदिन 45 से 50 हजार मीटर कपड़े का उत्पादन होता है। अनू ने बताया कि होम फर्निशिंग यथा पर्दे, बेड शीट, कवर के अलावा लीनन क्लब, शर्टिंग का कपड़ा तैयार होता है।
रेलवे व देश के कई राज्यों का सप्लाई होता है कपड़ा
उद्योग जगत में मैडम की फैक्ट्री के नाम से प्रसिद्ध स्वर्ण सिंथेटिक्स व श्रीश्याम टेक्सटाइल का कपड़ा देश के ज्यादातर राज्य में जाता है। हालांकि अनू अग्रवाल सीधे सप्लाई नहीं करती। बड़े ग्रुप के लिए काम करती हैं। फिर भी, उनके यहां बने पर्दे भारतीय रेलवे को सप्लाई होते हैं। रेलवे के अलावा दिल्ली, गुजरात, पूना, इंदौर जैसे बड़ी जगहों पर कपड़ा व होम फर्निशिंग आइटम जाते हैं।
फीमेल होने का फर्क कभी महसूस नहीं हुआ
अनू अग्रवाल का मानना है कि यदि कोई दिमागी तौर पर मजबूत है तो उसे लैंगिक भेद जैसी बातों का कभी आभास नहीं होता। उन्हें कभी फीमेल होने का फर्क महसूस नहीं हुआ। बस, इरादे होने चाहिए। समस्या परेशानी भाग जाती हैं और कामयाबी तो खुद चलकर आती है। स्कूल और बीटेक की पढ़ाई के दौरान कोई दिक्कत नहीं आई। और, न ही शादी के बाद और फैक्ट्री लगाने से लेकर अब तक कोई इस तरह की समस्या हुई। वे सुबह नौ बजे फैक्ट्री आती हैं और रात आठ बजे तक रुकती हैं। पहले माता पिता और शादी के बाद पति व सास ससुर ने उन्हें खूब सपोर्ट किया।
परिवार को भी देती हैं पूरा समय
अनू बताया कि फैक्टरी में भी पूरा समय देती हैं और परिवार में भी। आज भी वह तीनों समय का खाना खुद बनाती हैं। बाकी जिम्मेदारियों का भी खुद निर्वहन करती हैं। बेटे इंशात की आईआईटी (मैकेनिकल इंजीनियरिंग) के दौरान उसकी जरूरत थी तो सुबह ट्रेन से बेटे के पास चंडीगढ़ थीं और फिर वापस भिवानी। यह सिलसिला पूरे दो साल चला। लेकिन, फैक्ट्री को भी पूरा वक्त दिया। वे बताती हैं कि रोज सुबह चार बजे उठती हैं और रात साढ़े 10 बजे तक काम करती हैं। अनू के पति विकास अग्रवाल जीबीटीएल (बीटीएम) में जनरल मैनेजर हैं। अनू, बिजली विभाग से रिटायर्ड चीफ इंजीनियर आरके ढिंगरा की बेटी हैं।