एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) और ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान) के नियमों के अनुसार भले ही एक अक्तूबर से जिले में डीजल से चलने वाले 19 किलोवाटर क्षमता के जनरेटरों पर पाबंदी लग गई है। मगर अब भी धड़ल्ले से डीजल संचालित ये जनरेटर बिना रोक टोक के जहरीला धुआं उगल रहे हैं।
शहर में 48 निजी अस्पतालों सहित सरकारी संस्थाओं और करीब 78 औद्योगिक इकाईयों में डीजल से संचालित जनरेटर लगे हैं। इनमें फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है। ग्रैप के आदेशों के अनुसार इन डीजल इंजनों को ड्यूल फ्यूल सिस्टम से संचालित किया जाना था, ताकि हवा में प्रदूषण का स्तर न बढ़े। मगर अभी तक न तो कोई बदलाव हुआ है न ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारियों ने इनकी जांच शुरू की है।
ग्रैप के आदेशों के अनुसार अस्पतालों के साथ संस्थानों में लगे बड़े जनरेटरों में 70 फीसदी एलपीजी और 30 फीसदी डीजल इस्तेमाल किया जाना है या फिर इनका संचालन पूरी तरह से सीएनजी पर किया जाना है। इसको लेकर हिदायतें भी जारी हो चुकी है और संबंधित अधिकारियों को भी आदेश मिल चुके हैं। बावजूद इसके अभी तक डीजल इंजन को लेकर कोई प्रशासनिक हलचल नहीं है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से भी अस्पतालों में लगे डीजल जनरेटरों में बदलाव के निर्देश दिए जा चुके हैं।
अस्पतालों में दिया जा रहा है इमरजेंसी का हवाला
निजी अस्पतालों में इमरजेंसी वार्डों में दाखिल मरीजों के लिए जनरेटर लगे हैं। ये जनरेटर बिजली की झपकी लगते ही ऑटोमेटिक काम करने लग जाते हैं। ऐसे में निजी अस्पताल इन जनरेटरों का इस्तेमाल बंद करने के पीछे इमरजेंसी मरीजों की जान का हवाला देते हैं। इस संबंध में अपील भी की गई है, जिस पर अभी फैसला नहीं हुआ है। ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी वेट एंड वाच की स्थिति में हैं। इस संबंध में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जिला समन्वयक आरके भौंसले का कहना है कि ग्रैप के आदेशों के अनुसार डीजल संचालित जनरेटों में बदलाव के निर्देश दिए जा चुके हैं। एक्यूआई के हिसाब से जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।