बीएड कोर्स को लेकर विद्यार्थियों में घटते रुझान के कारण जिले के बीएड कॉलेजों में 60 प्रतिशत सीटें रिक्त बची हुई हैं। सरकारी और एडेड कॉलेजों में जहां निर्धारित एडमिशन शेड्यूल के तहत करीबन सभी सीटें फुल हो चुकी हैं लेकिन सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में बमुश्किल 40 प्रतिशत सीटों पर ही दाखिले हो पाए।
गौरतलब है कि वर्ष 2015 में प्रदेश सरकार की ओर बीएड कोर्स की समयावधि एक वर्ष से बढ़ाकर दो वर्ष कर दी थी। जिले के तीन सरकारी और एडेड कॉलेजों में 200 सीटें है तो वहीं 31 सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में सीटों की संख्या 3350 है। इस वर्ष सरकारी व एडेड कॉलेजों में जहां एडमिशन प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है, वहीं सेल्फ फाइनेंस बीएड कॉलेजों में 8 सितंबर तक दाखिले लिए जा सकते हैं। जिले के गवर्नमेंट बीएड कॉलेज में जहां 100 सीटों में से 89 पर दाखिला किया जा चुका है, तो एडेड कॉलेज में भी लगभग सभी सीटें भरी जा चुकी है। लेकिन अन्य प्राइवेट कॉलेज जहां बीएड सेल्फ फाइनेंस कोर्स चल रहा है। उनमें रिक्त 60 प्रतिशत सीटों पर अभी भी दाखिलों को इंतजार है। एडमिशन के लिए विद्यार्थियों के आवेदन न करने के कारण प्राइवेट कॉलेज संचालकों के लिए कॉलेज चला पाना भी कठिन हो रहा है।
सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में फीस ज्यादा, शिक्षकों की कमी
बीएड कोर्स को लेकर विद्यार्थियों में कमी का कारण काफी हद तक सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों के ज्यादा फीस वसूलना भी है। सरकारी कॉलेजों में जहां कोर्स की फीस जहां करीबन 17000 हजार रुपये है, तो वहीं सेल्फ फाइनेंस में 48000 रुपये तक प्रति वर्ष चार्ज किए जाते हैं। दो वर्ष का पाठ्यक्रम होने से सेलेबस बढ़ने, प्रायोगिक कार्य में बढ़ोतरी के बाद भी निजी कॉलेजों में शिक्षकों की कमी तो किताबें उपलब्ध न होना भी विद्यार्थियों के लिए परेशानी बनती है।
बीएड करने के बजाए पीजी को लेकर रुझान
स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद विद्यार्थी में दो साल बीएड कोर्स करने की बजाए पोस्ट ग्रेज्यूएशन करने को लेकर रुझान है। बीएड करने के बाद नौकरी मिलने के सीमित विकल्पों तो वहीं पोस्ट-ग्रेज्यूएशन कर एमफिल, पीएचडी, नेट (नेशनल एलिजिबिटी टेस्ट) क्वालीफाई करना बेहतर समझते हैं। क्योंकि इनके आधार पर किसी भी कॉलेज, यूनिवर्सिटी मेें असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिलने के ज्यादा चांस होते हैं।